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Tuesday, August 28, 2007

आगे ही आगे

आगे बढ़ पथिक तेरी रौशन है राहें ,
दूर कहीं बुला रहीं है फ़िर वही बाहें ,
रुकना क्या अब झुकना क्या ,
पर्वत आए या दरिया या मिले काटे मुझको
.
सांसे तेज और पैर लथपथ तो क्या ,
जीवन डगर पर पद चिह्न छोड़ते जाएंगे ,

पाएंगे जो पाना है जाएँगे जहाँ जाना है ,
अब ख़ुद पे भरोसा है मुझको
.
दिल के अरमान जगे हैं हम भी आगये आगे है ,
बांटने होठों की हँसी सबको ,
रात लम्बी तो क्या और काली तो क्या ,
बुला रहा है कल का सूरज मुझको
.
रास्ता लंबा तो क्या काम ज्यादा है ,
जिंदगी छोटी है बड़ा इरादा है ,
अब बैठने की फुर्सत कहाँ है मुझको ,
कैद करके नज़ारे उनको दिल में बसाके ,
बढ़ता हूँ आगे हीं आगे करता सलाम सबको ,
पकड़ के हाथ मेरा कुछ देर साथ चलो यारो ,
पर अब रुकने के लिए ना कहो मुझको

Nishikant Tiwari

2 comments:

Gyandutt Pandey said...

वाह, रॉबर्ट फ़्रॉस्ट की कविता की याद दिला दी!
The woods are lovely dark and deep, but I have promises to keep...

आप तो बड़ी सम्भावनाओं वाले व्यक्ति हैं! बहुत शुभ कामनायें.

Hindi Choti said...


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