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Showing posts from 2008

शहीदों की मौत होती सबको हासिल नहीं है

न्याय का बना बैठा रक्षक वही है जो
ख़ुद सर उठाने के काबिल नही है
तेरा सर उठता भी है तो भर के आँखों में आंसू
तू मर्द कहलाने के काबिल नही है |

बारूद का कालिख पोत गया कोई मुंह में
फ़िर भी खून तुम्हारा खौलता नही है
ये न सोंचो की बच जाओगे ओढ़ कर कायरता की चादर
कीडे मकोडों की मौत ,अरे मिलनी तुमको भी वही है |

राज जानते हो फ़िर भी खोये हो किस सोंच ,भंवर में
कुछ तो ऐसा करो की उठ सको अपनी नज़र में
हाँ,हर तरफ़ जंगल है और आग सी लगी है
कब तक रोते रहोगे हाथ मलते बैठे घर में |

कितना जोर का तमाचा मार गया कोई गाल पर
अब तो तरस खाओ अपने हाल पर
अभी भी पशुता न छोड़ी तो दिन दूर नही
जब बांधे जाओगे खूंटे से रस्सी डाल कर |

बस एक बार कदम उठा कर तो देखो
ख़ुद को जलाना इतना भी मुश्किल नही है
मर भी गए परवाने तो कोई गम नहीं
शहीदों की मौत होती सबको हासिल नहीं है |

Nishikant Tiwari

कि दर्द हीं दिल का दवा बन गया है

ख्यालों काकुछऐसासमांबंधगयाहै ,
कि दर्द हींदिलकादवाबनगयाहै ,
सपने बिखर रहेबनकेरेतहाथोंसे ,
जोबचाथा , कुछधुंवाकुछहवाबनगयाहै |

मंजीलेंथींमेरीतेरेआसपास ,
परजिस पेसाथचलतेथेवोरासताकिधरगया ,
जोनाडरताथाज़मानेमेंकिसीसे,
आजख़ुदक्योंअपनेआपसेडरगया |

क्योंयेजाननाज़रूरीथाकीकौनसही , कौनग़लतहै,
अबदूरहोकरक्योंपासआनेकीतलबहै,
फ़िरसेपुरानींगलतियोंको दोहराने कोजीचाहताहै ,
बदलेकीआरजूहैयाप्यारकीकशीशहै |

तुमहींरुकजाओकीवक्ततोरुकतानहीं ,
क्योंयेपर्वत

कुछ चार पक्तियाँ

1. गुजारिशें जानीं कितनी की थी,
पर ना हटाती थी झुल्फ़ें ना दिखाती थी चेहरा,
आज जो दिखाई है चेहरा तो कोई और बाँधे बैठा है शेहरा,
है उसके शादी की रात और घना कोहरा ।

2. वह हमेशा कहती थी कि मैं उसके दिल के पास हूँ,
मैं हमेशा सोंचता था कि दिल के पास क्यों दिल में क्यों नहीं,
जरुर इसमें कुछ ऐब है,जब सर झुका कर देखा जो दिल को ,
अरे दिल के पास तो जेब है ।

3. दिल नहीं सराय कि आज ठहरे कल चल दिए,
प्यार नहीं फ़ूल कि कभी बालों में लगाया कभी कुचल दिए,
जा बेवफ़ा नहीं करना कोई शिकवा गिले,
पर तू जहाँ भी जाए तुझको तेरा उस्ताद मेले ।
Nishikant Tiwari

है अगर ईश्क तो आँखो में उतर आने दे ।

चाहे मेरी चाहत को मोहब्बत का नाम ना दे,
पर अपने रुप तूफ़ान में बिखर जाने से ना रोक मुझे,
हर शाम भींगी रहे तेरे शबनम से कसम,
एक बार सही प्यार से देख मुझे ।

थम के रह गई है जो एक झनक तनहा,
अपने चाल की ताल पे फ़िर से थिरक जाने दे,
शर्म की पनाह से निकल कर ईश्क को लेने दो अँगड़ाईयाँ,
अपने जजबात को हालात से टकरा जाने दे ।

रहतीं हैं सलामत जहाँ प्यार की निशानियाँ सभी,
मेरी बेकरारियों को अपने दिल में ठहर जाने दे,
खुद को यूँ ना दो तुम सजा मुझसे नफ़रत करके’
है अगर ईश्क तो आँखो में उतर आने दे ।

Nishikant Tiwari

आज में सुनहरा कल

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आओ इस गुमसुम सफ़र में हँसी का कोई पल ढूंढ लें
इस अंधेरे आज में सुनहरा कल ढूंढ लें,
दो आँसु भी टपके तो मोती बन के,
कोई तो ऐसी जगह ढूंढ लें,
माना कि भरोसा नहीं आपको मेरी वफ़ाओं पर,
पर पास आने की कोई तो वजह ढूंढ लें,
इस गुमसुम सफ़र में हँसी का कोई पल ढूंढ लें
इस अंधेरे आज में सुनहरा कल ढूंढ लें ।

Nishikant Tiwari

मैं अकेला कब था !

मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी,
कुछ अधुरे सपने ,मेरी मुश्किलें ,मेरी कठनाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।

मेरे भावनाओं से खेला मेरे ऊसुलों का दाम लगा के,
बेबसी हँस रही थी मुझ पर कायरता का इल्जाम लगा के,
चुप था मैं पर लड़ रही सबसे मेरी परछाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।

समय ने कर के तीमिर से मंत्रणा,हर ज्योति को बुझा दिया,
स्वाभीमान के कर के टुकड़े-टुकड़े मझे घूटनों में ला दिया,
हर तरफ़ से मिल रही बस जग हँसाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।

जब देखा स्वयं को आईने में ,मैं टूट चूका था हर मायने में,
स्थिल कर रहा सोंच को ये बिन आग का कैसा धुआँ है,
ध्यान से देखा ,ओह ये आइना टूटा हुआ है,
और यही सोंच बन के जीत लेने लगी अँगड़ाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
Nishikant Tiwari

ना कभी मिलने की एक और कसम खा लें हम

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हर एक पल बेखबर है इश्क की परछाइयों से,
गैर की गलियां झूम रही मेरे हीं शहनाईयों से,
अब मुड़ कर कभी ना देखना,
कि दामन मेरा कैसे भींज रहा आँसुओ की विदाईयों से,

ना कभी मिलने की एक और कसम खा लें हम,
ये हम नहीं हमारे दिल कह रहे हैं,
देखो तो कितने खुश है सभी,
जहाँ फूटती थी चिंगारियाँ वहाँ फूल खिल रहे है,

रहने भी दो वो प्यार, वो सुहाना सफर, वो अनछुई मंजिले,
तेरे वादे और ईरादे सब बेमाने लग रहे है,
रास्ते बंद ना हुवे हो बेशक मगर,
मेरी तम्नाओं के पग थक गये हें।
Nishikant Tiwari

एक नये सुबह का इन्तज़ार

हर रात सिसकती बिलखती रह जाती है एक नये सुबह के इन्तज़ार में,
वह सवेरा आता भी है तो बस कुछ वादे करने के लिए ,
छोड़ जाता है सारा दिन आशा के दिए तले जलने के लिए,
शाम होते हीं फ़िर दिन ढल जाता है अपने सारे वादे तोड़ कर एक हीं बार में,
और फ़िर रात सिसकती बिलखती रह जाती है एक नये सुबह के इन्तज़ार में ।

बस इन्तज़ार इन्तज़ार अब और कितना,दिल में घुटन सागर जितना,
गुमसुम है वो,शायद जिन्दगी के मतलब तलाश रही है,
अपनी सांसो का मकसद ढुढने खातिर सारी सारी रात जाग रही है,
क्यों इस कशमकिश के बिना अधुरी है कहानी उसकी,
कोई समझा दे अकसर ऐसा हीं होता है प्यार में ,
हर रात सिसकती बिलखती रह जाती है एक नये सुबह के इन्तज़ार में ।
Nishikant Tiwari

A Lost Love (short story)

Oh, it’s almost quarter to five. I should hurry or I may be late for my M.B.A classes. In the month of June, it takes some time for the anger of the sun to settle down. When I reached my coaching classes, I was half bathed and was even late by ten minutes. At the doorstep when I asked for permission to get in, a girl sitting in the front seat stared me for a moment and then with a cute sarcastic smile whispered something to her friend sitting side by. Before I could settle down a number of questions caught my mind. Have I seen her before? Who is she? , What she murmured to her friend? …...Etc.

A M.B.A preparation class is a place where you may find student cum detective boys very smart at finding information related to girls. Again, there is a set of notorious chicks guiding you with expert’s comments on how to talk to with girls, make friendships with them and what there certain gesture or behavior means. I was bombarded with all such details. Her name is Saumyata.Today is her first c…