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कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है

उसकी आँखों में कितना प्यार कितनी सच्चाई दिखती
मेरी कितनी चिंता थी, कितना ख्याल रखती
जुदा होने की सोच के कैसे घबरा जाती
ऐसे गले लगती कि मुझमे समा जाती
उसके प्यार रस में भीग, लगता सब सही है
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

कितने साल महीने हर पल उस पर मरते रहे
अपनी खुशनसीबी समझ सब सहते रहे, सब करते रहे
हृदय की हर धड़कन उसका नाम पुकारा करती थी
जान हथेली पे ले दौड़ जाते जो एक इशारा करती थी
हामारे तो दिल में आज भी ज़ज्बात वही है
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

कहती कि बात किये बिना नींद नहीं है आती
अब क्या हो गया कि मेरा फोन नहीं उठती ?
सोच के है दम घुटता , साँसे रुकती है
निर्लज इन आँखों से गंगा जमुना बहती है
जितना मैं तड़प रहा, क्या मरता हर कोई है ?
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

जानू तुम ना मिले तो मर जाउंगी ज़हर खाके
अब किसी और संग पिज़ा खाती है कुर्सियां सटाके
पैर पे पैर रख केर घंटो बातें होतीं हैं
क्या सच में लड़कियां इतनी निर्दयी होती हैं ?
क्यों वो मेरे साथ ऐसा कर रही है ?
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

जब तक था उसे प्यार, लगता बस मेरे लिए बनी है
अचानक कैसे बाद…

चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है

लहराती हो जब आँचल तो पेड़ झूमते हैं
छुप छुप के देखते हम पेड़ो को चूमते हैं
उन्हें पहली बार देखते हीं  मर गये थे
खुद को रोग कैसा लगाकर उस दिन घर गए थे
नींद में हैं मुस्कुराते, जागते हुए रोते है
पागलपन को अपने मोहब्बत का नाम देते हैं
खुद की लगाई आग में हर पल ये काया जलती है
चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है |

जाने तेरा सजना सितम है या करम है
चाहती है मुझको सबको यही भरम है
माना  की वो मेरे बारे में बातें करती है
मतलब ये तो नही कि  मुझपे मरती है
हाँ उसने भी कभी देख मुझे मुस्कुराया था
पर मैं खुद हीं तो अपना दिल हार आया था
अब एक हारे हुए को तो जग हंसाई मिलती है
चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है |

उसकी बेरुखी को कैसे बेवफाई का नाम दे दें
खुद गलतियाँ करके कैसे इल्जाम दे दें
क्यों नहीं दोस्तों की बात मानता हूँ
धुप में जलता उसकी गली की खाक छानता हूँ
पढाई मेरी दिन भर चाय की दुकान पर चलती है
जाती है कहाँ वो,किस्से मिलती है
हर शाम अब तो मेरी ऐसे हीं ढलती है
चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है |

Nishikant Tiwari - Hindi Love Poem

यह न थी हमारी किस्मत

यह  न  थी  हमारी  किस्मत  कि  विसाल-ऐ -यार  होता ,
अगर  और  जीते  रहते  यही  इंतज़ार  होता !

ये मेरे भाग्य में नहीं था कि मैं अपने प्यार से मिल पाऊं |
मुझे उस घड़ी का इंतज़ार रहता अगर मैं उस समय तक जीता |
तेरे  वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ  जाता,
मैं खुशी से मर न जाती अगर ऐतबार होता |

तुम्हारे को सच मान लेते तो ये जान बेतलब जाता
क्योंकि ख़ुशी से मर ना गए होते अगर भरोसा होता |
हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना घर्ग-ऐ-दरिया
ना  कभी जनाज़ा उठता, ना कही मज़ार होता..|


हम इस तरह मर के क्यों बदनाम हुए इससे अच्छा तो समुन्द्र में डूब जाते
कभी जनाज़ा नहीं उठता ना कहीं मज़ार बनता
कोइ मेरे दिल से पूछे,  कि यह  तीर-ऐ-नीम कश  को
ये  खलिश कहाँ से होती  जो जिगर के पार होता |

कोई मेरे दिल से पूछे कि किस तरह तुम्हारा तीर इसके पार हुआ
मैं चुप चाप मर गई होती जो ये दिल के पार होता |

कहूं किस से मैं की क्या है, शब्-ऐ-गम बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना ? अगर एक बार होता |

अब मैं किस्से कहूँ कि गम कि रातें क्या होतीं हैं
मैं मर गई होती तो बस एक बार दर्द सहना पड़ता |

मिर्ज़ा ग़ालिब - Hindi romantic poem

मैं निपढ मुर्ख बाल ब्रह्मचारी

हर शाम जब  भी  मैं  छत  पे  टहलने  जाता
उसे  सामने  की छत  पे  मटकते   पाता
कभी  शर्मा  के  देखती,  कभी  देख  के  शर्माती
किताब  लिए  मुझे  देख  हमेशा कुछ  रटती  रहती |

मैं  था  निपढ  मुर्ख बाल  ब्रह्मचारी
वो कहाँ  कोई  साधारण  नारी
लड़की  देख  तो  मुझे  आये  पसीना
मोहल्ले  की कोई  छोरी  हो  या  करीना  कटरीना |

पागल होकर  मेरे  प्रेम  में
फिट  किये  बैठी  थी  मुझे  आँखों  के  फ्रेम  में
मुझे  तो  कबड्डी  तक  आती  न  थी
और  खींच  रही  थी  ओलम्पिक  के  गेम  में !

मन  ही  मन  मै  भी  उसपे  मरता  था
पर  आते  देख  घबरा  के  राह  बदल  लिया  करता  था
एक  दिन  बोली  रोक  के  मुझे  बीच  बाज़ार  में
तुझमे  कुछ  कमी  है  या कमी  है  मेरे  प्यार  में ?

क्या  कहूँ  लड़की  थी  या  परी
पर  मुझ पे  थी  क्यों  मिट - मरी
आखिर  मैंने  था क्या किया
जो  मानने  लगी  थी  पिया ?

अब  तो  आईने  में  जोश  से  बांहे  फुलाता
पर  छत  पे  जाते  हीं फिर  बिल्ली  बन  जाता
हो  सकता  सब  अगर  बस  जोश से
तो  गधे  जीत  कर  निकलते  घोड़ो  की  रेस  से |

एक  दिन  हिम्मत  करके  मैंने  भी  किये  इशारे
पर  हम  तो  नौसिखिये   …

बस एक मौका

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रूठी तो कई बार थी मुझसे ,
पर इतना दर्द तो ना होता था ,
जिस प्यार की खातिर किये कितने समझौते ,
वो प्यार खुद में एक समझौता था |

दूर होके वो मुझसे कितनी खुश है ,
पहले तो यकीं नहीं होता था ,
टूटे सपनो की चीखें सोने नहीं देतीं ,
उसके अदाओं में खोया पहले भी कहाँ सोता था |

उस घर के आते हीं मेरे कदम तेज हो जाते हैं ,
जिसकी खिड़की पर मैं घंटों खड़ा होता था ,
संभाल लेता खुद को जब पहली बार उसे देखा था ,
पास मेरे बस वही एक मौका था |

Nishikant

प्यार का बलिदान

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छू कर तेरे गालों को ,क्या मिला मुझे इनकी कोमलता छीन कर
बिखरा के कजरा आंसुओ से अब इन्हें और न मलिन कर
हर सदमे से उबर जाऊँगा ,सदा की तरह मेरा आज भी यकीन कर |

अपनी खुशियों का बलिदान देकर ,मात-पिता को खुश करने चली है
जीवन जितना जटिल है, उतनी ही तू भोली पगली है
इस वियोग में कितना तड़प रही है तू ,मेरे प्यार में भी जली है |

छीन कर स्वयं को मुझसे ,अपने आप से ही रूठी है
मुझसे बिछड़ने का अब गम नहीं ,तेरी बातें तेरी हंसी जितनी झूठी है
तू निकल गई है प्रीत की जाल से ,उंगली में फंस गई मेरी अंगूठी है !!

by Nishikant Tiwari-  hindi love poem pyaa ka balidaan

एक समझौता कर लेता हूँ

जब याद करके तेरा उदास मुखड़ा हृदय फटने लगता है
और अपनी रिश्ते की अनिश्चिताओं में मन भटकने लगता है
काम करते करते ,सब के सामने जब आँखों में नमी सी उभरने लग जाती है
एक समझौता कर लेता हूँ
रोने का भी वक्त कहाँ ,दो चार आहें भर लेता हूँ |

थक कर जब तेरे कंधे पर सर रख के सोने का मन करता है
सब छोड़ जब तेरे पास आ जाने का मन करता है
जब तुम बिन जीवन का अर्थ और उद्देश्य धूमिल दिखाई पड़ते है
एक समझौता कर लेता हूँ
तू न सही ,तेरी तस्वीर को बांहों में भर लेता हूँ |

दिल को कितना समझाया पर जजबात नहीं बदलते
सब करके देखा ,हालात नहीं बदलते
जब बदल नहीं सकता इन हांथो की लकीरों को
एक समझौता कर लेता हूँ
डूब कर प्यालों में शाम बदल लेता हूँ |

तुम बिन कितना घर खाली, कितने हम अधूरे हैं
इन्टरनेट,फिल्मे,टीवी मन बहलाने के साधन तो बहुतेरे हैं
फिर भी अकेलेपन से जब जी घबराने लग जाता है
एक समझौता कर लेता हूँ
लोग कहे इसे पागलपन ,मैं आईने से बाते कर लेता हूँ |

Nishikant

Hindi Love Poem

हर बार मुझसे अब ये होता नहीं है

कितना भी यत्न कर लूं
टीस है जो कम होती नहीं है
रोता है रोम रोम मेरा
बस ये आँखें हैं जो रोती नहीं हैं |

रोज़ सोचता हूँ कि आज सोऊंगा चैन से
ओढ़ कर सपनों की चादर
पावँ हो गए है लम्बे मेरे
ये चादर भी पूरी होती नहीं है |

देख कर खुद को यकीं होता नहीं है
क्या से क्या हो गया मै ,क्या ये सही है ?
किस पर करूं ऐतबार मेरे यारों
कि अब तो खुद पे भी भरोसा होता नहीं है |

हाँ उसकी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी है
बार बार ,हर बार मुझसे अब ये होता नहीं है
हाँ दिल ने मजबूर किया था प्यार हो गया
पर प्यार खुद कोई मज़बूरी तो नहीं है |

Nishikant Tiwari

Hindi Love Poems