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एक समझौता कर लेता हूँ

जब याद करके तेरा उदास मुखड़ा हृदय फटने लगता है
और अपनी रिश्ते की अनिश्चिताओं में मन भटकने लगता है
काम करते करते ,सब के सामने जब आँखों में नमी सी उभरने लग जाती है
एक समझौता कर लेता हूँ
रोने का भी वक्त कहाँ ,दो चार आहें भर लेता हूँ |

थक कर जब तेरे कंधे पर सर रख के सोने का मन करता है
सब छोड़ जब तेरे पास आ जाने का मन करता है
जब तुम बिन जीवन का अर्थ और उद्देश्य धूमिल दिखाई पड़ते है
एक समझौता कर लेता हूँ
तू न सही ,तेरी तस्वीर को बांहों में भर लेता हूँ |

दिल को कितना समझाया पर जजबात नहीं बदलते
सब करके देखा ,हालात नहीं बदलते
जब बदल नहीं सकता इन हांथो की लकीरों को
एक समझौता कर लेता हूँ
डूब कर प्यालों में शाम बदल लेता हूँ |

तुम बिन कितना घर खाली, कितने हम अधूरे हैं
इन्टरनेट,फिल्मे,टीवी मन बहलाने के साधन तो बहुतेरे हैं
फिर भी अकेलेपन से जब जी घबराने लग जाता है
एक समझौता कर लेता हूँ
लोग कहे इसे पागलपन ,मैं आईने से बाते कर लेता हूँ |

Nishikant

Hindi Love Poem