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Friday, February 12, 2016

अरमान जगाएं


इतना सोच समझ के
कब तक चलेंगे खुद से बच के
क्यों न फिर बेपरवाह हो जाएँ
एक दूजे में फिर से खो जाएंं ।

थोड़ा इठला के शर्मा के
थोड़ा मुस्कुरा गुनगुना के
शिकायतों को तमाशा दिखाएँ
मीठी यांदो को दावत पे बुलाएँ ।

बिखरी बांतो को समेट के
बांधो गठरी जरा कास के
 सफर बहुत है लम्बा
कहीं गाँठ खुल न जाए ।

देखता है कौन छुप छुप के
आज जाने ना पाये बच के
उसे छेड़े गुदगुदाए , सताए
उस अजनबी से नयन लड़ाए ।

ना समझ की बांते, ना आज कोई टोके
शोर मचाएं तोड़ टांग सुरों के
जलती रहीं मशाले, बुझ गए अरमान
आज मशालों को बुझा के फिर से अरमान जगाएं ।

Nishikant Tiwari

Hindi Love poem





Saturday, August 9, 2014

मेरी याँदे

शाम सवेरे तेरे बांहों के घेरे ,
बन गए हैं दोनों जहाँ अब मेरे
क्या मांगू ईश्वर से पा कर तुझे मैं
क्या सबको मिलता है ऐसा दीवाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

चले जाते ऑफिस, कैसी ये मुश्किल
तुम बिन कुछ में भी नहीं लगता दिल
मेरे पास बैठो, छुट्टी आज ले लो
हो रही बारिश,है मौसम कितना सुहाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

वो घर से निकला, हजार कपडे बदलना
लबों पे लाली लगाना मिटाना
इतरा के पूछना कैसी लग मैं रही हूँ
आज फिर भूल गई नेल पालिश लगाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

बेसब्री से करती इतंजार, जल्दी आये शुक्रवार
कुछ अच्छा बनाती ,ज्यादा ही आता प्यार
धीमी रौशनी में फ़िल्म देखते देखते
कभी नींबू पानी पीना कभी आइसक्रीम खाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

फूले गालों को खींचना , थपकियों से जगाना
शनिवार इतवार कितना मुश्किल उठाना
पांच मिनट बोल फिर से सो जाते
भला कब तुम छोड़ोगे मुझको सताना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

बांतों ही बांतो में कभी जो बढ़ जातीं बातें
रूठे रहते ,दिनों तक नहीं नज़र मिलाते
मुझे रोता छोड़,मुँह फेर सो जाते
क्या इतना मुश्किल था गले से लगाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

डरते डरते तुम्हे सोते हुए प्यार करते
तुम से झगड़ के जीते न मरते
घंटो कंधे पे तुम्हारे सर रख के रोते रहते
तुम बिन आंसुओं का नहीं अब ठिकाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

जब पहली बार साथ रहने आई
कितना में खुश थी हाँ थोड़ी घबड़ाई
कितनी मस्ती की हमने, थोड़ी लड़ाई
बहुत याद आता अपना प्यारा आशियाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

By Nishikant Tiwari

Romantic hindi poem

Saturday, July 12, 2014

तीन नमूने

कॉलेज के नमूनो में था नंबर पहला,दूसरा व तीसरा
गोबर के ढ़ेर से निकले ,झा,ठाकुर और मिसरा
कॉलेज की माल तम्मना के लट देख मिसरा को डर लगता है
ठाकुर को उसपे डायन चुड़ैल का असर लगता है
ज्ञानी झा कहते है ई तो शहर का फैशन है
क्या गाँव में नहीं रचाते मेहंदी,लगाते उबटन है ?

जाने किस युग में अवतरित हुआ ये ब्रह्मचारी
मिसरा कॉलेज की लड़की को कहता है नारी
मूरख जेट के जमाने में चला रहा बैल गाड़ी
आज दुशाशन मिल भी जाए, कहाँ मिलेगी खींचने को साड़ी
माइक्रो पहन के कहती है मैं हूँ बड़ी शर्मीली
अगर बेशर्म हो जाए तो पैंट हो जायेगी गीली  !!











मिसरा रोज़ चंदन घीस रहा, भोलेनाथ आप से हो जाएँ
बोले प्रभू -पर इस जमाने में पार्वती कहाँ से लाएं ?
गलती से पड़ क्या गया स्वेता के सैंडल का हिल
मिसरा के घायल हुए दोनों पाँव और दिल
उसने हमदर्दी में बातें क्या कर ली दो - चार
बटुक महाराज को हो गया उससे प्यार

एक दिन तिलक लगा के बोल बड़ा दिल का हाल
अच्छे हो पर अभी बच्चे हो सुन हुआ मुंह लाल
ये सारे आशिक अपनी मर्दानगी कैसे जताते है
क्या इसीलिए वे इन्हे अँधेरे कोने में ले जाते हैं ?
सपना चूर हुआ,बेचारे मिसारा का गया दिल टूट
इस गम में कई रात वो रोता रहा फूट-फूट ।

ऐसे मर्द भी होते है जो लड़की के नाम पे रोते हैं !!
हम ठाकुर हैं ,हम लड़की पटाते नहीं उठा लेते है
हमारे यहाँ तो लड़कियां नाचती है नोट पर
जो नहीं नाचती, उन्हे नचाते है बन्दूक की नोक पर
हमारे डर से इस कदर काँपता है पूरा लखनऊ
पंक्षी पर नहीं मारता ,बिल्ली तक नहीं करती म्याऊ ।

एक दिन मीनी ने आवाज दी तो ठाकुर चौंका
लड़की से बतियाने का था पहला मौका
लटपटा गई जबान, काँपने लगा थर थर
कहो मीनी बजाय क.. कमीनी बोल पड़ा घबराकर
मीनी ने फिर ऐसा मारा खींच के चाटा
5 फुट का ठाकुर और भी हो गया नाटा ।








झाजी दिल नहीं दिल की बोरी लाए थे गाँव से लाद
कॉलेज में छीट रहे थे ऐसे जैसे खेंतो में खाद
झा ने खुद नहीं था पहले कभी कम्प्यूटर देखा
आओ तुम्हें माऊस चलाना सिखाता हूँ रेखा
बहाने से दिन भर हाथ पे हाथ रख मज़ा लूटा
शाम को पता चला तो पाण्डे  ने खूब कूटा ।

मेरा प्यार रूठा, आईआईटी छूटा ,इसे कहते होनी
कम से कम तुम तो मेरी हो जाओ सलोनी
कसम से हम तुमसे बहुत करते हैं प्यार
सच में  मर जाएंगे जो तूने किया इनकार
हम !! क्या अपने साथ लाये हो पूरा गाँव ?
अंकल कहीं और जाके फेको अपना ये दाँव ।

तुम पैदा हुई तो बेबी, बड़ी हुई तो बेबी और हम अंकल ?
हाँ अंकल,बकवास बंद कर और पतली गली से निकल
गुस्से से भरकर झा ने जैसे ही उसकी बाह मरोड़ी
पता नहीं कहाँ से एक टीचर आ गई दौड़ी दौड़ी
पूरे कॉलेज के सामने बनना पड़ गया मुर्गा
कॉलेज की सारी लड़कियाँ बहने हैं ,हैं माँ दुर्गा |

चालबाज निकला चम्पारण का चंपू बिहारी
कविता सुना सुना बाजी मार ले गया तिवारी
तम्मना को उसमे क्या दिख गया ख़ास
सारा दिन तो करता रहता है बकवास
रास लीला देख तीनो के छाती पर सांप लोट रहे है
कैसा इसका पत्ता काटा जाए सोच रहे हैं !!

Nishikant Tiwari

Funny hindi poem

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Monday, April 8, 2013

आओ सखी साथ एक शाम गुजारे

आओ सखी साथ एक शाम गुजारे
हरे नरम घास पर बैठे डूबते सूरज को देखे
अलसाए हुए बिना कुछ कहे एक दुसरे को घंटो निहारें
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

फैसला ये तुमको करना हीं होगा आज
क्या तुम्हे भी मुझ पर है इतना नाज़
क्या हम भी तुम्हे लगते है इतने हीं प्यारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

जिंदगी है एक सफ़र पर ठहराव तो चाहिए
गलियों से गुजारे कितने मगर अपना एक गाँव तो चाहिए
प्रेम की बस्ती हो किसी नदिया किनारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

ये पल फिर नहीं आयेंगे बार-बार
हांथों में हाँथ डाल आज कर लो इकरार
या लाज के घुंघट से हीं कुछ तो करो इशारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

अपना मुझे कभी तुमने कहा कि नहीं
क्या करूँ नादान हूँ ,कुछ समझता नहीं
सताओ न यूँ , ना सताके तुम
गुस्सा करो मुझसे रूठी रहो,नखरे सहूँ सभी मैं तुम्हारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

Nishikant Tiwari - romantic hindi kavita 

Sunday, February 17, 2013

प्यार की मिठाई या मिठाई से प्यार !!

तुम मिले तो दिल मिले
नाच रहे है बल्ले बल्ले
जश्न मनाये आओ खाए मिल रसगुल्ले ।

जी जान से मुझपे मरती है
पर शक भी कितना करती है
जिसे समझ रही जलेबी असल में इमरती है ।

जिंदगी के सौ जंजाल सौ बखेड़े
रास्ते है कठिन टेढ़े मेढ़े
ऐसे में तेरे बोल लगते मथुरा के पेड़े ।

मुस्कुरा रही मंद मंद है
क्या कोई लल्लू आ गया पसंद है ?
या चुपके चुपके खा रही कलाकंद है |

आँख मेरी फिर भर आई
तूने जो की मुझसे बेवफाई
अकेले अकेले खा रही रसमलाई !

कंगले है सब,बस एक वही अमीर है
जिसकी ऐसी तक़दीर है
कि खाई तेरे हाथ की खीर है ।

खुशामद कितनी करू, क्या चाटू तलवा ?
कहा तो तू लड़की नहीं जलवा है जलवा
अब तो बता दे कहाँ छुपा रखा गाजर का हलवा !

बात मेरी कभी तो लो तुम सुन
लाए गुलाब, क्या करूँ मैं इससे दातुन ?
इससे तो अच्छा ले आते गुलाब जामुन ।

ना कोई गलती या बात बड़ी है
नाराज़ है ,आज फिर मुझपे बिगड़ी है
लाये माल पुआ ऊपर नहीं रबड़ी है ।

समझ रहा था इसको बुद्धू
झाँसे में आ गया रे गुड्डू
बहला फुसला के छीन ली मोतीचूर लड्डू ।

जान मेरी तू लाखो में एक है
जितनी सुन्दर दिल उतना ही नेक है
क्या कहूँ डोडा बर्फी या मिल्क केक है ।

उसे कातिल कहूँ या काजू कतली
गुजरिया है खोया गुजिया
बबुनिया मीठी जस बुनिया ।

मादक बड़ा ये मोदक है
मलाई है, लोग कहतें हैं माल आई है
सोहन हलवा है , उसके आते ही सब हल हुआ है।

एक दिन बोली, सुनो मेरे सोनू मेरे हमदम
आती है शरम फिर भी कहते है हम
तुम मेरे बालूशाही और मैं तेरी चम् चम् ।

शादी को हाँ कह दी कि आएगा बहुत मज़ा
बारात सजेगी,धूम मचेगी , बजेगा बैंड बाजा
सज के आयेंगे दुल्हे राजा साथ में सिलाव खाजा !!!!!!

By Nishikant Tiwari - Meethi Haasya Kavita


Wednesday, October 17, 2012

कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है

उसकी आँखों में कितना प्यार कितनी सच्चाई दिखती
मेरी कितनी चिंता थी, कितना ख्याल रखती
जुदा होने की सोच के कैसे घबरा जाती
ऐसे गले लगती कि मुझमे समा जाती
उसके प्यार रस में भीग, लगता सब सही है
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

कितने साल महीने हर पल उस पर मरते रहे
अपनी खुशनसीबी समझ सब सहते रहे, सब करते रहे
हृदय की हर धड़कन उसका नाम पुकारा करती थी
जान हथेली पे ले दौड़ जाते जो एक इशारा करती थी
हामारे तो दिल में आज भी ज़ज्बात वही है
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

कहती कि बात किये बिना नींद नहीं है आती
अब क्या हो गया कि मेरा फोन नहीं उठती ?
सोच के है दम घुटता , साँसे रुकती है
निर्लज इन आँखों से गंगा जमुना बहती है
जितना मैं तड़प रहा, क्या मरता हर कोई है ?
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

जानू तुम ना मिले तो मर जाउंगी ज़हर खाके
अब किसी और संग पिज़ा खाती है कुर्सियां सटाके
पैर पे पैर रख केर घंटो बातें होतीं हैं
क्या सच में लड़कियां इतनी निर्दयी होती हैं ?
क्यों वो मेरे साथ ऐसा कर रही है ?
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

जब तक था उसे प्यार, लगता बस मेरे लिए बनी है
अचानक कैसे बादल गई, नहीं होता यकीं है
प्यार को तो कब का दफना दिया, आती नहीं दया भी
न आँखों में कुछ शर्म है कि तुमने है कुछ किया भी
नफरत तुमसे फिर भी इस जन्म में मुमकिन नहीं है
कल तक था उसे प्यार, आज नहीं है |

Nishikant Tiwari - Hindi love poem (bewafai)

Tuesday, October 16, 2012

चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है

लहराती हो जब आँचल तो पेड़ झूमते हैं
छुप छुप के देखते हम पेड़ो को चूमते हैं
उन्हें पहली बार देखते हीं  मर गये थे
खुद को रोग कैसा लगाकर उस दिन घर गए थे
नींद में हैं मुस्कुराते, जागते हुए रोते है
पागलपन को अपने मोहब्बत का नाम देते हैं
खुद की लगाई आग में हर पल ये काया जलती है
चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है |

जाने तेरा सजना सितम है या करम है
चाहती है मुझको सबको यही भरम है
माना  की वो मेरे बारे में बातें करती है
मतलब ये तो नही कि  मुझपे मरती है
हाँ उसने भी कभी देख मुझे मुस्कुराया था
पर मैं खुद हीं तो अपना दिल हार आया था
अब एक हारे हुए को तो जग हंसाई मिलती है
चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है |

उसकी बेरुखी को कैसे बेवफाई का नाम दे दें
खुद गलतियाँ करके कैसे इल्जाम दे दें
क्यों नहीं दोस्तों की बात मानता हूँ
धुप में जलता उसकी गली की खाक छानता हूँ
पढाई मेरी दिन भर चाय की दुकान पर चलती है
जाती है कहाँ वो,किस्से मिलती है
हर शाम अब तो मेरी ऐसे हीं ढलती है
चाहत के मारो को बस तन्हाई मिलती है |

Nishikant Tiwari - Hindi Love Poem 

Monday, October 15, 2012

यह न थी हमारी किस्मत


यह  न  थी  हमारी  किस्मत  कि  विसाल-ऐ -यार  होता ,
अगर  और  जीते  रहते  यही  इंतज़ार  होता !

ये मेरे भाग्य में नहीं था कि मैं अपने प्यार से मिल पाऊं |
मुझे उस घड़ी का इंतज़ार रहता अगर मैं उस समय तक जीता |

तेरे  वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ  जाता,
मैं खुशी से मर न जाती अगर ऐतबार होता |

तुम्हारे को सच मान लेते तो ये जान बेतलब जाता
क्योंकि ख़ुशी से मर ना गए होते अगर भरोसा होता |

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना घर्ग-ऐ-दरिया
ना  कभी जनाज़ा उठता, ना कही मज़ार होता..|


हम इस तरह मर के क्यों बदनाम हुए इससे अच्छा तो समुन्द्र में डूब जाते
कभी जनाज़ा नहीं उठता ना कहीं मज़ार बनता

कोइ मेरे दिल से पूछे,  कि यह  तीर-ऐ-नीम कश  को
ये  खलिश कहाँ से होती  जो जिगर के पार होता |

कोई मेरे दिल से पूछे कि किस तरह तुम्हारा तीर इसके पार हुआ
मैं चुप चाप मर गई होती जो ये दिल के पार होता |

कहूं किस से मैं की क्या है, शब्-ऐ-गम बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना ? अगर एक बार होता |

अब मैं किस्से कहूँ कि गम कि रातें क्या होतीं हैं
मैं मर गई होती तो बस एक बार दर्द सहना पड़ता |

मिर्ज़ा ग़ालिब - Hindi romantic poem

Thursday, October 11, 2012

मैं निपढ मुर्ख बाल ब्रह्मचारी

हर शाम जब  भी  मैं  छत  पे  टहलने  जाता
उसे  सामने  की छत  पे  मटकते    पाता
कभी  शर्मा  के  देखती,  कभी  देख  के  शर्माती
किताब  लिए  मुझे  देख  हमेशा कुछ  रटती  रहती |

मैं  था  निपढ  मुर्ख बाल  ब्रह्मचारी
वो कहाँ  कोई  साधारण  नारी
लड़की  देख  तो  मुझे  आये  पसीना
मोहल्ले  की कोई  छोरी  हो  या  करीना  कटरीना |

पागल होकर  मेरे  प्रेम  में
फिट  किये  बैठी  थी  मुझे  आँखों  के  फ्रेम  में
मुझे  तो  कबड्डी  तक  आती  न  थी
और  खींच  रही  थी  ओलम्पिक  के  गेम  में !

मन  ही  मन  मै  भी  उसपे  मरता  था
पर  आते  देख  घबरा  के  राह  बदल  लिया  करता  था
एक  दिन  बोली  रोक  के  मुझे  बीच  बाज़ार  में
तुझमे  कुछ  कमी  है  या कमी  है  मेरे  प्यार  में ?

क्या  कहूँ  लड़की  थी  या  परी
पर  मुझ पे  थी  क्यों  मिट - मरी
आखिर  मैंने  था क्या किया
जो  मानने  लगी  थी  पिया ?

अब  तो  आईने  में  जोश  से  बांहे  फुलाता
पर  छत  पे  जाते  हीं फिर  बिल्ली  बन  जाता
हो  सकता  सब  अगर  बस  जोश से
तो  गधे  जीत  कर  निकलते  घोड़ो  की  रेस  से |

एक  दिन  हिम्मत  करके  मैंने  भी  किये  इशारे
पर  हम  तो  नौसिखिये   थे  इस  खेल  में  प्यारे
पता  नहीं  क्या खोट  हो  गई
वो  हंस  हंस  के  लोट  पोट  हो गई |

वो  बेचारी  कितनी  तड़पती, कितनी  रोती  थी
पर  सामने  जाने  की  मेरी  हिम्मत  ही  न  होती  थी
कितने  महीने  खुद  को  वो  ऐसे  ही  तडपाती
अब  तो  पेड़  पर  रहती  कबूतरनी  भी  बन  गई  थी  दादी |

राखी  के  दिन  जाने  क्यों  गुस्सा  थी  अम्मा
तुझसे  कोई  मिलने  आया  है  नालायक  निक्कमा
मेरी  तो  पतलून  उतर  गई  थी
राखी  का  थाल  लिए  वो  सामने  खड़ी  थी !

एक  टक  देखी  मुझे  गौर  से
अह  फिर  बाँध  दी  राखी  जोर  से
आखिर  उसे  क्यों  ना  लगती  मिर्ची
पिताजी  उसके  बन  सकते  थे  ससुरजी |

रोज़  उसे  छुप  छुप  देखा  करता  हूँ
उस  दिन  को  याद  करके  आंहे  भरता  हूँ
वो  भी  इशारे  करती  है
मुझ  पे  नहीं  मेरे  बाजू  वाले  पर  मरती  है !!
Nishikant Tiwari - Hindi Comedy Poem

Thursday, July 12, 2012

बस एक मौका

boy in tears
रूठी तो कई बार थी मुझसे ,
पर इतना दर्द तो ना होता था ,
जिस प्यार की खातिर किये कितने समझौते ,
वो प्यार खुद में एक समझौता था |

दूर होके वो मुझसे कितनी खुश है ,
पहले तो यकीं नहीं होता था ,
टूटे सपनो की चीखें सोने नहीं देतीं ,
उसके अदाओं में खोया पहले भी कहाँ सोता था |

उस घर के आते हीं मेरे कदम तेज हो जाते हैं ,
जिसकी खिड़की पर मैं घंटों खड़ा होता था ,
संभाल लेता खुद को जब पहली बार उसे देखा था ,
पास मेरे बस वही एक मौका था |

Nishikant

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