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तेरे प्यार में तब से आज तक 
किशमिश सी जलती मस्तियाँ
लपट- झपट उठता मीठा मीठा धुआँ
ओस से भीगे घास पे धधकते कोयले
फिर भी ठण्ड से काँपती सिकुड़ती वादियाँ !

सिलवटों के सिलसिले में सिमटा हुआ मैं
वो सर्दियों में गर्मियों के दिन गिनता हुआ मैं
अन्घुआया हुआ निहारता तेरी अंगड़ाई
पानी के बुलबुलों सा बनता मिटता हुआ मैं  !

तेरे सम्मोहन से फिर न कभी ना मौसम बदला
कभी मल्हार, कभी बिरहा गाता फिरता पगला
एक धुरि है , नज़रे हैं या छुरी है
घायल दिल पे करती रहतीं है हमला !

आज तक बन्दा बंदी बन नाम तेरा ही रटता
कारे नीरस काग से परिणत हुआ चहकता तोता
निंद्राहीन रातों को उठ उठ कर तेरा रूप निहारते
लड़की है या पारी , आज भी यकीं नहीं होता !!



Hindi romantic love poem - Nishikant Tiwari

रफ़्तार पकड़ रही है जिंदगी

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रफ़्तार पकड़ रही है जिंदगी  उसकी आँखों में विनय था या अभिनय क्या पता  मासूम मुखड़ा देख कालेजा फटता, हृदय टूटता रहा  सारी ख़ुशी, धन-वैभव, देह-अंग जैसे दूर हुआ  याद नहीं पहले कब इतना मजबूर हुआ  खुद को संभाल लू, इस पल कोई कोई रोक ले   रफ़्तार पकड़ रही है जिंदगी !!

याद नहीं सोया था खोया था  हाँ उस रात मगर मैं बहुत रोया था  मिन्नतें मजबूरियों में जंग थी छिड़ी हुई  एक झलक बस दिखला जाते आस पास यहीं कहीं  दूर जाके मिलने का तुमसे वक्त कहाँ  रफ़्तार पकड़ रही है जिंदगी !!
खुद को याद करूँ या तुमको भूलूँ रोज़ ही अपना मन टटोलूं  दूर जाके तू जितना पास है  पास होके भी उतना पास नहीं  और कुछ लिख सकूं, इतना समय मेरे पास नहीं  रफ़्तार पकड़ रही है जिंदगी !!
Nishikant Tiwari
Hindi Poem

अरमान जगाएं

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इतना सोच समझ के
कब तक चलेंगे खुद से बच के
क्यों न फिर बेपरवाह हो जाएँ
एक दूजे में फिर से खो जाएंं ।

थोड़ा इठला के शर्मा के
थोड़ा मुस्कुरा गुनगुना के
शिकायतों को तमाशा दिखाएँ
मीठी यांदो को दावत पे बुलाएँ ।

बिखरी बांतो को समेट के
बांधो गठरी जरा कास के
 सफर बहुत है लम्बा
कहीं गाँठ खुल न जाए ।

देखता है कौन छुप छुप के
आज जाने ना पाये बच के
उसे छेड़े गुदगुदाए , सताए
उस अजनबी से नयन लड़ाए ।

ना समझ की बांते, ना आज कोई टोके
शोर मचाएं तोड़ टांग सुरों के
जलती रहीं मशाले, बुझ गए अरमान
आज मशालों को बुझा के फिर से अरमान जगाएं ।

Nishikant Tiwari

Hindi Love poem




मेरी याँदे

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शाम सवेरे तेरे बांहों के घेरे ,
बन गए हैं दोनों जहाँ अब मेरे
क्या मांगू ईश्वर से पा कर तुझे मैं
क्या सबको मिलता है ऐसा दीवाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

चले जाते ऑफिस, कैसी ये मुश्किल
तुम बिन कुछ में भी नहीं लगता दिल
मेरे पास बैठो, छुट्टी आज ले लो
हो रही बारिश,है मौसम कितना सुहाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

वो घर से निकला, हजार कपडे बदलना
लबों पे लाली लगाना मिटाना
इतरा के पूछना कैसी लग मैं रही हूँ
आज फिर भूल गई नेल पालिश लगाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

बेसब्री से करती इतंजार, जल्दी आये शुक्रवार
कुछ अच्छा बनाती ,ज्यादा ही आता प्यार
धीमी रौशनी में फ़िल्म देखते देखते
कभी नींबू पानी पीना कभी आइसक्रीम खाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

फूले गालों को खींचना , थपकियों से जगाना
शनिवार इतवार कितना मुश्किल उठाना
पांच मिनट बोल फिर से सो जाते
भला कब तुम छोड़ोगे मुझको सताना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

बांतों ही बांतो में कभी जो बढ़ जातीं बातें
रूठे रहते ,दिनों तक नहीं नज़र मिलाते
मुझे रोता छोड़,मुँह फेर सो जाते
क्या इतना मुश्किल था गले से लगाना
फिर लौट आएगा वो गुजरा ज़माना ।

डरते डरते तुम्ह…

तीन नमूने

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कॉलेज के नमूनो में था नंबर पहला,दूसरा व तीसरा
गोबर के ढ़ेर से निकले ,झा,ठाकुर और मिसरा
कॉलेज की माल तम्मना के लट देख मिसरा को डर लगता है
ठाकुर को उसपे डायन चुड़ैल का असर लगता है
ज्ञानी झा कहते है ई तो शहर का फैशन है
क्या गाँव में नहीं रचाते मेहंदी,लगाते उबटन है ?

जाने किस युग में अवतरित हुआ ये ब्रह्मचारी
मिसरा कॉलेज की लड़की को कहता है नारी
मूरख जेट के जमाने में चला रहा बैल गाड़ी
आज दुशाशन मिल भी जाए, कहाँ मिलेगी खींचने को साड़ी
माइक्रो पहन के कहती है मैं हूँ बड़ी शर्मीली
अगर बेशर्म हो जाए तो पैंट हो जायेगी गीली  !!











मिसरा रोज़ चंदन घीस रहा, भोलेनाथ आप से हो जाएँ
बोले प्रभू -पर इस जमाने में पार्वती कहाँ से लाएं ?
गलती से पड़ क्या गया स्वेता के सैंडल का हिल
मिसरा के घायल हुए दोनों पाँव और दिल
उसने हमदर्दी में बातें क्या कर ली दो - चार
बटुक महाराज को हो गया उससे प्यार

एक दिन तिलक लगा के बोल बड़ा दिल का हाल
अच्छे हो पर अभी बच्चे हो सुन हुआ मुंह लाल
ये सारे आशिक अपनी मर्दानगी कैसे जताते है
क्या इसीलिए वे इन्हे अँधेरे कोने में ले जाते हैं ?
सपना चूर हुआ,बेचारे मिसारा का गया दिल टूट
इस गम में कई रात…

आओ सखी साथ एक शाम गुजारे

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आओ सखी साथ एक शाम गुजारे
हरे नरम घास पर बैठे डूबते सूरज को देखे
अलसाए हुए बिना कुछ कहे एक दुसरे को घंटो निहारें
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

फैसला ये तुमको करना हीं होगा आज
क्या तुम्हे भी मुझ पर है इतना नाज़
क्या हम भी तुम्हे लगते है इतने हीं प्यारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

जिंदगी है एक सफ़र पर ठहराव तो चाहिए
गलियों से गुजारे कितने मगर अपना एक गाँव तो चाहिए
प्रेम की बस्ती हो किसी नदिया किनारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

ये पल फिर नहीं आयेंगे बार-बार
हांथों में हाँथ डाल आज कर लो इकरार
या लाज के घुंघट से हीं कुछ तो करो इशारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

अपना मुझे कभी तुमने कहा कि नहीं
क्या करूँ नादान हूँ ,कुछ समझता नहीं
सताओ न यूँ , ना सताके तुम
गुस्सा करो मुझसे रूठी रहो,नखरे सहूँ सभी मैं तुम्हारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे |

Nishikant Tiwari - romantic hindi kavita