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Monday, July 30, 2007

खामोशी और बरसात की रात

रुक गई थी धरती रुक गया आसमान था,
रुके हुए थे हुम दोनो और रुका सारा जहान था,
ना रुकी थी तो बस यह खामोशी और यह बरसात ।

ऊपर नीला आसमान और आसमान मेम छाए काले बादल,
नीचे खड़े थे पेड़ के हम दोनो जाने किन ख्यालो में पागल,
एक विचित्र सी खामोशी थी फिर भी समा खामोश ना था,
बिजली कड़क रही थी , बादल गरज़ रहे थे,
हवाएँ गुनगुना रहीं थी फिर भी मैं चुप था,
ना बन पा रही थी बात बस होती जा रही थी बरसात ।

ये नज़रें बस नज़रों को देखती जाती थी,
शायद वह भी वही सोंच रही होगी जो मैं सोच रहा था,
कि ये लड़का कौन है कि ये लड़की कौन है,
पर मुझे तो इतना भी होश ना था कि मैं कौन हूँ,
हम दोनो अनज़ान थे फिर भी लग रहा था मानो वर्षो की पहचान हो,
जैसे वही मेरी जिन्दगी वही मेरी जान हो ।

सालो से ख्यालो मे आकर तंग जो करती रही है ,
आज सामने है और कुछ नही कर रही है ,

पता नही क्या बात है बस होती जा रही बरसात है ।

ईस अनजानी सी जगह पर जानी पहचानी खुशबु कैसी ,
शायद चंपा चमेली या मोंगरा की महक है ,

या फिर का नशा जो मुझे धिरे धिरे दीवाना बनाता जा रहा है ।

उसने मुझसे ओवर कोट माँगा ,मैं बोला क्यों तंग करती हो ,
(मेरा मतलब ख्यालों मे आकर तंग करने से था)
वह रुठ गई और मुँह फेर ली ,
काले बाल काले बादल और ये काली रात ,
मुझे जिन्दगी मे सब कुछ काला हीं काला नज़र आ रहा था ,
मेरे हाथ बढाते हीं वह अन्तर्ध्यान हो गई ।

वह बाहो से दूर जा सकती है निगाहो से दुर जा सकती है ,
पर दिल से दूर कैसे जाएगी,मैं जानता हूँ ,
वह फिर मेरे ख्यालो मे आकर मुझे रात भर जगाएगी ।

Nishikant Tiwari

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