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Saturday, October 8, 2011

प्यार का भ्रम (Hindi Love Stories)

इश्क में धोखा मिले या प्यार ये तो अपने अपने किस्मत की बात है | इस कम्बख्त इश्क ने अनगिनत लोगो को बर्बाद किया है | रोज़ बर्बादी के नए नए किस्से सुनते है फिर भी प्यार करना नहीं छोड़ते | आखिर क्यों ? कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे प्यार से प्यारी दुनिया में कोई चीज नहीं तो कभी यह सब एक झूठ ,छलावा मालूम पड़ता है | यह प्यार हीं है जो जानवर को इंसान बनता है और ये ही वक्त आने पर उसे हैवान बना देता है | तो कुल मिलकर नुक्सान हीं हुआ ना ,जानवर से हैवान बन गए | प्रकाश पार्क के बेंच पर बैठा यही सब सोच रहा था |अपने प्यार के सफ़र के हर एक पड़ाव को याद करके मंथन में लगा हुआ था |सौम्या जिसे वो आंठवी कक्षा से प्यार करता था ऐसा करेगी उसने सपने में भी नहीं सोचा था |उससे जुड़ी छोटी से छोटी याद आँखों से बड़ी बड़ी बूंदों को नीचे घास पर धकेले जा रही थी |

उसके प्यार की शुरुआत तब हुई जब वो सत्य निकेतन के आठवी कक्षा में पड़ता था |हॉस्टल के कमरे में इसके साथ विपुल रहता था | वो पांचवी कक्षा में पड़ता था | विपुल के माता पिता अक्सर उसे मिलने आया करते थे |वे बड़े अछे लोग थे ,हर बार प्रकाश के लिए कुछ ना कुछ ज़रूर लाते |एक रविवार की बात है ,प्रकाश बदन सिकोड़े, चादर लपेटे सोया हुआ था | इतनी देर तक कोई सोता है भला | एक मीठी सी आवाज़ आई | प्रकाश सपना देख रहा था ,उसे लगा कोई लड़की उसे सपने में जगा रही है | एक दो बार पुकारने के बाद भी कोई हलचल न हुई देख कर लड़की ने चादर जोर से खिंचा | प्रकाश हड़बड़ा कर उठा | सामने एक सुन्दर सी लड़की खड़ी थी |उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अब भी वो सपना देख रहा है या सही में कोई उसके सामने खड़ा है | घूरता रहा | आखिरकार लड़की ने चुप्पी तोड़ी "मुझे माफ़ कर दीजिये "| मुझे लगा की विपुल है | मैं उसकी बड़ी बहन हूँ |
प्रकाश अभी भी हतप्रभ था |समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहे फिर भी खुद को संभालता हुआ बोला "कोई बात नहीं ,बल्कि अच्छा हुआ आपने जगा दिया |मैं तो विल्कुल आलसी हो गया हूँ | विपुल खेलने गया होगा |बैठिये मैं उसे बुला कर लाता हूँ | यह कहते हुए प्रकाश विपुल को ढूढ़ने निकल गया | कुछ देर में लौट कर बोला ,वो तो मिल नहीं रहा है | आप यही इंतज़ार कीजिये थोड़ी देर में आ जाएगा |कमरे में सन्नाटा छा गया |एक एक पल घंटो के समान मालूम पड़ने लगे |दोनों सर निचे किये हुए बैठे हुए थे | बीच बीच में एक दुसरे को देखने की कोशिश करते और कभी नज़रे टकराते हीं शर्म से पलके नीची कर लेते |

उस रात जब प्रकाश सोने गया तो आँखों में नींद नहीं |उसी ध्यान लगा हुआ था |अफ़सोस करता ,काश कुछ बाँतें कर लेता | जाने कब फिर किसी लड़की से बात करने का मौका मिले |कम से कम नाम तो पूछ हीं लेता | वो बेसब्री से अगले रविवार का इंतज़ार करने लगा कि शायद वो फिर आये | ऐसा हुआ भी पर उस दिन विपुल कमरे में मौजूद था सो बात के नाम केवल औपचारिकता हीं हुई | प्यार की चिंगारी किसी दीया-बाती की मोहताज़ नहीं ,नाहीं उसे शोला बनने के लिए घी तेल की आवश्यकता पड़ती है |वो तो कभी भी ,कही भी भड़क सकती है | रूप नारी का सबसे बड़ा श्रृंगार होता है और सोम्या में इसकी कोई कमी नहीं थी | उसके एक हीं मुस्कान से ऐसी चिंगारी भड़की कि प्रकाश दिन रात उसकी जलन में तड़पने लगा | आग के करतब दिखाने वाले भी अक्सर उसी आग से जल जाते हैं | सोम्या भी कहाँ बचने वाली थी | दो चार मुलाकातों में हीं ये शोला सोम्या को भी जलाने लगा | पहले तो वो पगली सकुचाई फिर उसे एहसास हुआ कि अगर कोई निहारने वाला हीं ना हो तो ये रूप ,ये श्रृंगार किस काम का | जिस तरह कोई भवरा किसी सुंदर कली के चारो ओर चक्कर काटता रहता है उसी प्रकार प्रकाश की भी दुनिया सोम्या तक सिमित हो गई | उसकी हर बात सोम्य से शुरू होती और सोम्या पर हीं ख़त्म होती | वे छुप छुप के मिलते | खूब सारीं बातें होतीं | साथ जीने मरने की कसमें खायी जातीं |फिल्मों के डायलेक्ट चुरा-चुरा के सुनाये जाते | उनका प्यार ,प्यार कम बचपना ज्यादा मालूम पड़ता था | लेकिन समय के साथ उनमें परिपक्वता आ गई | तीन साल बीत गए | सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक विपुल ने दोनों को साथ देख लिया |एक झटके में हीं सब समझ गया | घरवालों को सारी खबर दे दी |

सौम्या के पिताजी आग बबूला हो गए | उसका घर से निकलना बंद कर दिया |उन्होंने सौम्या को कसम खिलाई कि वह प्रकाश से अब कभी नहीं मिलेगी |जब प्यार सर चढ़ के बोलता है तो कुछ नहीं सूझता | प्यार के नाम पर किया गया हर काम सही लगता है |उस काम को इश्वर के पूजा से तुलना की जाती है |सौम्या की भक्ति कम नहीं हुई पर उसका प्रकाश से मिलना पहले से ज़रूर कम हो गया | जहाँ वो पहले सप्ताह में २-३ मिल लेती थी ,वहीँ २-३ सप्ताह में एक-आध बार मिलने लगी |बारहवीं पास करते हीं प्रकाश का चयन दिल्ली के एक मशहूर मेडिकल कॉलेज में हो गया |उसका मन तो बिलकुल नहीं था कि वर्धमान छोड़ कर दिल्ली जाए पर क्या करता कैरिरार का सवाल था ,सो जाना पड़ा | उधर सौम्या का दाखिला वर्धमान के हीं एक कॉमर्स कॉलेज में हो गया |



दोनों को दिन अब सूना-सूना मालूम पड़ता | रात को झींगुर विरह गीत जाते सुनाई पड़ते |फोन पर चाहे जितनी बाँतें हो जाए पर वो नज़रों का टकराना ,शर्म से कपोलो का लाल हो जाना ,वो अदाएं ,वो इठलाना सब जाता रहा | प्रकाश अकसर ये गीत "हो कर मजबूर उसने बुलाया होगा " सुनता रहता | वो जानता था कि सौम्या तो शहर से बाहर जा नहीं सकती सो वो ही दो तीन महीने पर उससे मिलने वर्धमान चला जाता | वक्त इंसान को हर हाल में रहना सिखा हीं देता है | समय के साथ इन्होने भी एक तरह से समझौता कर लिया | मिलने की तड़प कम हो गई सो प्रकाश का वर्धमान जाना भी कम हो गया | हाँ पर फोन पे बाँतें होतीं रहती | वह हमेशा सौम्या से आग्रह करता रहता "सौम्या कभो तो दिल्ली आओ |"करीब दो साल बाद उसकी मुराद पूरी हुई | सौम्या ने ट्रेनिंग की झूठी कहानी बना कर अपने पिता को मना लिया | उसने कहा कि दिल्ली में अपने सखी के साथ गिर्ल्स हॉस्टल में ठहरेगी |

ट्रेन से उतरते हीं वो प्रकाश के बांहों में कुछ इस तरह समा गई जैसे कोई चंचल नदी रेगिस्तान में समा जाती है | वो उसे सीधे अपने कमरे पर ले आया |पिताजी को यकीन दिलाने के लिए सौम्या ने प्रकाश के हीं कॉलेज के किसी लड़की का नंबर दे दिया और कह दिया को वो उसके साथ रह रही है |फिर से वही पुराने सुख के दिन लौट आये थे | प्रकाश ने कॉलेज जाना बंद कर दिया | दिन भर उससे बाँतें करना ,उसके जुल्फों से खेलना ,उसे घुमाने ले जाना |उसका अब बस यही काम रह गया था | उसने सौम्या को दिल्ली की हर घुमने वाली जगह दिखाई ,दोस्तों से उधार लेकर खूब सारी खरीददारी कराई | अब दिन ज्यादा उज्जवल और रातें और भी गहरी नज़र आती | एक रोज़ दिन सही में बहुत उज्जवल था | बहुत तेज धूप के बावजूद दोनों लाल किला घुमने गए | शाम को कमरे पर लौटते लौटते गर्मी से हालत खराब हो गई सो आज वो जल्दी सो गयी | प्रकाश अभी तक जाग रहा था | यह रात बाकी रातों से अलग थी | सौम्या के केश बिखरे पड़े थे | कपड़ो में सिलवटे पड़ गयीं थीं | उसके अलसाए यौवन का उभार प्रकाश पर रह रह के प्रहार कर रहा था | वो लाख नज़रें हठाने की कोशिश करता पर कुछ हीं पलों में आँखे वही टिक जाती |पहली बार उसने सौम्या को ऐसे देखा था | पहली बार उसने इतने करीब से महसूस किया कि अब वह बच्ची नहीं रही | बंद कली सुंदर फूलों का आकार ले चुकी थी | वो काम-ज्वर से तपने लगा |


वह बार बार उसके तरफ बढ़ता और पास जाते हीं वापस आ जाता | इस अंतर्द्वंद से निकल पाना उसके लिए इतना आसान नहीं | कभी उसे लगता कि ये सब गलत है,पाप है तो कभी सही ,बल्कि उसका अधिकार है और ये अधिकार सौम्या ने हीं उसे दिया है | न रात ख़त्म हो रही थी न उसे नींद हीं आ रही थी | बत्ती बुझा कर अगर सोने की कोशिश भी करता तो कुछ हीं देर में फिर उठकर निहारने लगता | किसी तरह रात कटी | अगले दिन प्रकाश सौम्या से नज़रें नहीं मिला पा रहा था | अचानक प्रकाश के व्यवहार में आये बदलाव को सौम्या समझ नहीं पा रही थी | वह जब भी उससे इस बारे में पूछती ,वो टाल जाता | सौम्या भी कम नहीं थी ,उसने खाना-पीना छोड़ दिया | आखिरकार मजबूर होकर प्रकाश ने रात की सारी घटना कह सुनाई |

सौम्या - छिः कैसी गन्दी बातें करते हो |तुम्हे तनिक भी शर्म नहीं आती क्या ? प्रकाश - "इसमें गलत क्या है ? हम इतने दिनों से एक दुसरे को चाहते है ,साथ जीने मरने की कसमें खाते है तो फिर ये संकोच क्यों ?" सौम्या - "मान मर्यादा भी कोई चीज़ होती है | यह सब हमारें संस्कृति के खिलाफ है |न बाबा न ,शादी से पहले यह सब कुछ नहीं |" प्रकाश - "तो ठीक है शादी कर लेते है |" सौम्या - "शादी कोई मजाक है जो एक क्षण में लिए फैसले से कर लिया जाए " |


इस बात को लेकर रोज़ दोनों में जम के बहस होती | प्रकाश कई बार बहुत हीं ज्यादा उग्र हो जाता | प्रकाश जिसे सौम्या के प्यार ने इंसान बनाया था आज वही प्यार उसे हैवान बनने पर मजबूर कर रहा था | एक दिन प्रकाश इतना गुस्सा हो गया कि जैसे सौम्या को
मार हीं बैठेगा | सौम्या डर गई ,बोली अब मैं एक पल नहीं रुकुंगी यहाँ | मुझे तो अब तुमसे डर लगने लगा गई | तुम हैवान बन गए हो | प्रकाश - "यह तुम क्या कह रही हो !,मैंने सारी दुनिया से केवल तुम्हारी खातिर दुश्मनी मोल लिए बैठा हूँ और तुम्हे मुझसे डर लग रहा है ? प्रकाश ने बहुत मनाया, समझाया, सैकड़ो बार माफ़ी मांगी पर वो नहीं मानी ,रोते रोते अपना सामान बंधने लगी | प्रकाश- "पर तुम जाओगी कहाँ ? तुम तो कह के आई थी ट्रेनिंग ३ सप्ताह की है | अभी तो बस १५ दिन हीं हुए है |"दिल्ली में हीं मेरी एक दोस्त रहती है ,उसी के पास चली जाउंगी |" जब वो कमरे से सामन लेकर निकले लगी तो प्रकाश ने उसका हाथ पकड़ लिया | सौम्या उसे नाख़ून से चीरती हुई निकल गई | जाते हुए एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा | ये कहावत है कि इन्सान को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए पर जिंदगी में कभी कभी ऐसे हालत बन जाते है जब उसे पीछे मुड़कर देखना पड़ता है | आज इसकी बेहद जरुरत थी पर सौम्या ने ऐसा नहीं किया | प्रकाश भक सा दरवाजे पर खड़ा उसे जाते हुए निहारता रह गया |


Hindi Love Stories - Pyaar ka Bhram by Nishikant Tiwari

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