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Friday, February 12, 2016

अरमान जगाएं


इतना सोच समझ के
कब तक चलेंगे खुद से बच के
क्यों न फिर बेपरवाह हो जाएँ
एक दूजे में फिर से खो जाएंं ।

थोड़ा इठला के शर्मा के
थोड़ा मुस्कुरा गुनगुना के
शिकायतों को तमाशा दिखाएँ
मीठी यांदो को दावत पे बुलाएँ ।

बिखरी बांतो को समेट के
बांधो गठरी जरा कास के
 सफर बहुत है लम्बा
कहीं गाँठ खुल न जाए ।

देखता है कौन छुप छुप के
आज जाने ना पाये बच के
उसे छेड़े गुदगुदाए , सताए
उस अजनबी से नयन लड़ाए ।

ना समझ की बांते, ना आज कोई टोके
शोर मचाएं तोड़ टांग सुरों के
जलती रहीं मशाले, बुझ गए अरमान
आज मशालों को बुझा के फिर से अरमान जगाएं ।

Nishikant Tiwari

Hindi Love poem





4 comments:

abhishant sharma said...

बहुत खूब!
आइए मेरे ब्लॉग https://abhishantsharma.blogspot.com पर और अपने विचार प्रस्तुत करें। धन्यवाद!

abhishant sharma said...

बहुत खूब!
आइए मेरे ब्लॉग https://abhishantsharma.blogspot.com पर और अपने विचार प्रस्तुत करें। धन्यवाद!

Tonima Watson said...


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Abhishek Singh said...

Hi Nishikant,
Good Job!
Kindly visit http://hindicreator.blogspot.com/ for more poems and Ghazals.

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