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Monday, November 14, 2011

जन्मदिन (Hindi Love Stories)

२६ सितम्बर 2011 कोई विशेष दिन नहीं था |सब कुछ सामान्य ही था | सूर्य सदैव की तरह पूरब में ही उगा था | हवा की रफ़्तार भी शांत  थी | दूधवाला दूध पहुंचा रहा था | अखबारवाला घरों में अखबार फेकता जाता था | बच्चे स्कूल के लिए तैयार हो रहे थे उनके माता पिता ऑफिस के लिए| कुल मिलाकर सभी जीवन की नीरसता में व्यस्त थे सिवाए एक के दिव्या | उसने रात करवटों में काटी थी यह सोचते हुवे कि कल वो क्या क्या करेगी | आज का दिन उसके लिए खास था |आज मेरा जन्मदिन जो था | सभी लोग अपना जन्मदिन बड़े धूम-धाम से मानते हैं | केक काटा जाता है | मिठाइयाँ बांटी जाती है | दावत उडाये जाते है | बड़ी मौज-मस्ती होती है | मैं जन्मदिन मनाना आत्मप्रशंषा जैसा समझता हूँ | मुझे नहीं लगता कि पैदा होकर मैंने कोई महान काम कर दिया है जिसके लिए इतना शोर मचे | मैं अपना जन्मदिन उस दिन मनाऊंगा जब मैं जिंदगी में ऐसा मुकाम हासिल कर लूँगा जिसपर मुझे गर्व हो | जब भी कोई मुझसे मेरे जन्मदिन के बारे में पूछता भ्रमित करने के लिए कोई भी दिन बता देता |
यह सभी जानते है कि लड़कियां कितनी हठी होतीं हैं | हमारे शास्त्र भी यही कहते है कि स्त्रियों और बच्चों से प्यार से पेश आना चाहिए, वे बड़े हठी होतें है | दिव्या ने एक दिन जिद्द करके मुझ से जन्मदिन उगलवा हीं लिया | उसके लिए जन्मदिन खास महत्व रखता है | अपने हर दोस्त को फोनकर जन्मदिन की बधाई देना ,खास दोस्तों को बधाई के साथ उपहार भेजना उसकी आदत है फिर वो अपने सबसे प्रिय दोस्त का ये दिन कैसे भूल जाती |
२६ सितम्बर के पहले वाली रात को उसे नौ बजे से हीं नींद आ रही थी पर किसी तरह आँखों में पानी झोंक-झोंक कर जगी रही | ठीक बारह बजे उसका फ़ोन आया -"हैप्पी बर्थडे टू यू "  |
मै थोडा अनजान बनते हुए  -"किस बात के लिए ?"
"आज तुम्हारा जन्मदिन है ना !!"
"नहीं, किसने कह दिया !"
"झूट मत बोलो |तुम्हीं ने बताया था कि आज तुम्हारा जन्मदिन है | मैं कुछ नहीं जानती |"
मैं खुद पर नाराज़ हो रहा था |बेकार में उसे जन्मदिन बता दिया | अब फालतू का हो-हल्ला होगा  |
मैं कर्कश स्वर में बोला -"बोला ना आज मेरा जन्मदिन नहीं है सो नहीं है |"
दिव्या-"तुमने झुठ  क्यों बोला ?"
"ऐसे ही ,तुम बार-बार पूछ रही थी सो मैंने ऐसे ही कोई दिन बता दिया |"
उसका फिर से वही रट कि मैंने झुठ क्यों बोला | हाँ पर इसबार उसकी आवाज़ कुछ भरी हो गयी थी |आँखों में आंसू भी झलक हीं गए होंगे | इससे पहले की बात और बढे मैंने फोन स्विच ऑफ कर दिया | इतना सब होने के बाद नींद कैसे आ सकती थी | लेटे हुए सोचता रहा-"वैसे तो मैं कोई अच्छा काम करता नही हूँ कम से कम कुछ बुरा तो ना करूँ | वो भी आज के दिन आज तो मेरा जन्मदिन है | उस बेचारी को अकारण हीं रुला दिया | मैं भी तो बेकार की जिद्द किये बैठा हूँ | " कई बार मन हुआ कि उसे सच बता दूँ पर हर बार मेरे जिद्द ने मुझे रोक लिया | मेरे भीतर चल रहे इस अंतर्द्वंद को निद्रा एक घंटे तक दूर से निहारती रही फिर धीरे-धीरे पास आती गई और कब मुझे बांहों में समेट लिया पता ही नहीं चला |
प्रातः आँख खुली तो दिन को मैंने अलग नज़रिये से देखने की कोशिश की | शायद औरों को आज का दिन विशेष दिखता हो पर मुझे कुछ भी अलग नहीं लगा | मैंने बरामदे में जा कर अनूठापन तलाशने का प्रयास  किया  पर कोई लाभ नहीं | दूधवाला ,अखबारवाला , सब्जीवाला सभी रोज की तरह अपने काम में व्यस्त थे | ना सूरज की किरणों में कोई जादू था ना शीतल ब्यार में | तुरंत हीं मोह-पाश से निकला और स्नान करने चला गया | आकर देखा की फोन में ढेरों मिस कॉल और sms थे | सब दिव्या के |
"तुम मेरा फोन क्यों नहीं उठा रहे |प्लीज एक बार मुझसे बात कर लो | मुझे पता है मैं तुम्हे बहुत तंग कर रही हूँ | आई ऍम सॉरी बस एक बार बात कर लो |"
इससे पहले कि फोन करता उसका वापस से फोन आ गया |
"क्या हुआ ,फोन क्यों नहीं उठा रहे थे ?"
"मैं बाथ रूम में था |"
"अच्छा सुनो ना |"
"हाँ बोलो मैंने कान नहीं बंद कर रखे |" मैं पता नहीं क्यों बेरुखी से बात कर रहा था |इतना तो अब समझ में आ हीं गया था कि आज का दिन मेरे लिए अलग कैसे है |
दिव्या -"क्या तुम मेरे साथ ऑफिस चलोगे ?"
"नहीं तुम जाओ ,मैं स्वयं आ जाऊँगा |"
"मेरे साथ चलो ना |"
मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा |
"क्यों ?"
"ऐसे हीं |" मैं उससे अनायस हीं लड़ रहा था | मैं उससे नाराज़ क्यों था ? बस इस लिए कि उसने जन्मदिन की बधाई दी ?या इसलिए कि उसके जीवन में मैं इतना महत्व क्यों रखता हूँ ?
वो बार-बार आग्रह करती रही और मैं मना करता रहा | हर आग्रह में उसकी आवाज़ पहले से भारी होती जा रही थी | गला रुन्धता जा रहा था जैसे वो किसी दल-दल में फंसती जा रही थी फिर भी कदम बढाए जा रही थी | मैंने फोन काट दिया तो उसने पुनः प्रयास किया | यह क्रम कई बार हुआ | अंत में मुझे हार माननी पड़ी और साथ जाने के लिए तैयार हो गया |इससे पहले कि वो मेरे फ्लैट पर पहुँचती मैं अतिशीघ्र तैयार हो निकल गया और सड़क किनारे प्रतीक्षा करने लगा | थोड़े हीं देर में वो अपने स्कूटी से आ पहुंची | आँखे लाल सुझीं हुईं ,भृकुटी सिमटी हुई मुखड़े पर एक विचित्र सी उदासी | उसका मासूम सा चेहरा भूख से बिलखते गरीब शिशु सा हो गया था | वो भी तो प्यार की भूखी थी जो आज उसे मिल नहीं पा रहा था | उसे इस हालत में देख हृदय करुणा और ग्लानि से भर गया | वो कहते हैं ना कि चीता अपने शारीर के निशान नहीं छोड़ता |  इतना सब होने पर भी अपनी व्याकुलता छिपाते हुए रोष का मिथ्या अवारन ओढ़कर बोला -"चलो ऑफिस |"
"क्या आप मुझसे नाराज हो ?"
"नहीं |"
"तो फिर ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे ?"
"ऐसे हीं और ये ज़रूरी तो नहीं कि इन्सान हर समय हिहियाता रहे |"
दिव्या -"अच्छा सुनो ना |"
"हाँ बोलो |"
"थोड़ी देर के लिए फ्लैट पर चलोगे क्या ?"
 
"क्यों हमें तो ऑफिस जाना है |"
"नहीं प्लीज चलो ना |"
"तुम हर चीज़ में जिद्द क्यों करने लगती हो ?चुप-चाप ऑफिस चलना है तो चलो वरना मैं अकेले हीं चला जाऊंगा |" यह कहकर चलने हीं लगा था कि उसने हाथ पकड़ लिया | उसके नयनों से बहती अश्रुधारा मुझे जाने क्या क्या कह रही हो पर वो निः शब्द मुझे देखती रही |उसकी मनोदशा को ब्यान करने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं थी | अश्रुओं ने बाढ़ जैसी स्थिति उतपन्न कर दी जिसे तैर कर पार कर पाना मेरे लिए संभव ना था | मौन का उत्तर मैंने मौन से हीं दिया और सर लटकाए फ्लैट की ओर वापस लौट चला जैसे की मेरी गाड़ी छुट गई हो |  

उसने अपने बैग से उपहार निकाल के मेरे सामने रख दिया | बोली -"ये तुम्हारे लिए लाई थी तुम्हारा जन्मदिन समझकर |मैं इसे वापस नहीं ले जा सकती |"
"मैं इसे नहीं ले सकता | मैं उपहार स्वीकार नहीं करता और वैसे भी आज मेरा जन्मदिन नहीं है | इसे वापस से जाओ |"
"मैं पहले से हीं बहुत दुखी हूँ ,मुझे और चोट मत पहुँचाओ | यह सोचकर कि आज तुम्हारा जन्मदिन है मैं पिछले १५ दिनों से तैयारी में लगी थी | आज के पल-पल की प्लानिंग कर ली थी | तुम्हे पता है मैं काजल नहीं लगाती | आज बस तुम्हारे लिए लगा कर आई थी |"
अचानक उसके संयम का बाँध फिर टूट गया और आंसुवों की बाढ़ काजल को धोने लगी | अब तो मेरी अंतरात्मा भी मुझे धिक्कारने लगी थी | अपराध का भाव मुझे बेड़ियों सा जकड़ा जा रहा था | दुनिया में मेरी माँ के अलावा ऐसा कौन होगा जिसने मेरे लिए आज रोया हो | नहीं मैं स्वयं अपने हांथो इस निर्मल हरे प्यार पल्लव को नहीं मसल सकता था | बोलना चाहा कि आज हीं मेरा जन्म हुआ है पर आवाज़ हीं नहीं निकल पाई |  उसने एक चेन निकला जिस पर बड़ी मेहनत से मेरा नाम गुथा हुआ था | आंसुवों की बड़ी-बड़ी बूंदे चेन पर गिरने लगीं | जिन्हें निराकार इश्वर दिखाई नहीं देते वो मंदिरों में उन्हें ढूढ़ते फिरते है | मैं  भी उन्ही हीं की तरह अँधा बना बैठा था | वो मेरे नाम पर रो रही थी इसमें अब दो राय नहीं थी | मेरी आँखों से पश्चाताप बह चला | मैंने झट से उसे गले लगा लिया | दोनों के अश्रु मिले तो दिल भी मिल गए | मैंने धीरे से उसकी कान में कहा -"आज हीं मेरा जन्मदिन है पगली |"

Hindi love stories -janmdin - by Nishikant Tiwari

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