तुम कब बोलोगे (Hindi Love Stories)

मैं हर रोज़ की तरह ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर बरामदे में. खड़ी सड़क को निहार रही थी | मैं रोज़ ऐसा करती थी | इस भागम भाग भरी जिंदगी में यही वो कुछ पल होते थें जो मैं शांत भाव से गुजारती थी | बड़ा सुकून मिलता और जब मन पूरी तरह शांत हो जाता तो दिन भर का कार्यक्रम तय करती | आज जितनी ताजगी महसूस हो रही थी उतनी जाने कब से नहीं हुई थी | मैंने ऑफिस की गाड़ी के बजाय रिक्शा से ऑफिस जाने का फैसला किया | गुडगाँव में fortune 500 में से कम से कम २०० कम्पनियों के ऑफिस है फिर भी यहाँ रिक्शा चलना आम बात है | मुझे भी रिक्शा ढूढने में कोई परेशानी नहीं हुई | ऊँची ऊँची इमारतो के बीच से टूटे-फूटे रास्तो से गुजरते हुए ऐसा मालुम हो रहा था जैसे किसी ने धोती के उपर कोट पहन ली हो |जब तक रिक्शा गली से निकला नहीं था तब तक तो बड़ा अच्छा लगा पर मेन रोड पर आते हीं धूल ने सारे मेक उप का सत्यानाश कर दिया |अपने फैसले पर अफ़सोस हो रहा था पर क्या कर सकती थी | किसी तरह ऑफिस पहुंची | रोज़ की हीं तरह मैं शिखा को लेकर चौथे मंजिल पर गई जहाँ कैंटीन है | नास्ता करते हुए मैंने देखा कि एक लड़का मुझे घूर रहा है |जैसे हीं मैंने उसकी तरफ देखा वो सर नीचा करके नास्ता करने लगा | थोड़ी देर बाद वो फिर मुझे घूरने लगा | मैंने शिखा के कान में धीरे से कहा - देखो सामने वाली टेबल पर बैठा लड़का मुझे कब से घूरे जा रहा है |
शिखा - "तुम उसे जानती हो क्या ?"
अरे नहीं रे मैं उसे नहीं जानती | वो तो जो एक नई आईटी कंपनी उपने हीं बिल्डिंग के नीचले मंजिल पर खुली है उसमे काम करता है | देखती नहीं उसने गले में अपनी कम्पनी का पट्टा पहना हुआ है |
शिखा - "हाँ मैं भी उसे कब से देखे जा रही हूँ कि वो हमारी तरफ देख रहा है | हो सकता है कि वो तुम्हे देख रहा हो पर मुझे लगा कि वो मुझे घूर रहा है क्योकि बीच - बीच जब मैंने उससे नैना चार करना चाहा तो उसने नजरें नीची नहीं कीं | मुझे लगा कि नज़रे नीची नहीं करके वो जताना चाहता है कि मैं उसे पसंद हूँ |"
मैंने मन हीं मन कहा शिखा क्या समझती है अपने आप को | उससे मै कहीं ज्यादा सुंदर हो तो फिर कोई मुझे छोड़ के उसे क्यों देखेगा |

लंच के समय वो नहीं दिखा | अगले दिन भी नहीं | शुक्रवार को नास्ता करते समय फिर देखा , हमें घूरते हुए | रात को जब बिस्तर पर लेटी तो उसी का ख्याल आया | मैंने भी ध्यान दिया कि जब शिखा उसे देखती है तो वो नज़रे नहीं झुकाता और मेरे देखते हीं सर झुका लेता है | शायद शिखा ठीक सोच रही हो कि वो लड़का उसे पसंद करता हो पर क्यों ? क्यों मेरी जैसी खुबसूरत लड़की को छोड़ कर कोई शिखा को ........ | यही सोचते सोचते जाने कब आँख लग गई |

सोमवार को खूब बन ठन के ऑफिस पहुंची | किलर जींस और रेड टी सर्ट पहन कर | आज देखती हूँ वो किसे देखता है | आज वो नास्ता करने नहीं आया | बहुत देर तक कैंटीन में बैठी सोचती रही कि क्यों मैं अपने जीने का तरीका बदल रही हूँ ,वह भी एक ऐसे इन्सान के लिए जिसके बारे में कुछ नहीं जानती | यह भी नहीं कि वो मुझे पसंद करता भी है या नहीं | शिखा कोई बच्ची नहीं थी |वो खूब समझ रही थी कि आज मै जान बूझ कर ज्यादा सज सवर के आई हूँ और कुछ न कुछ बहाने बना के उसका इन्तजार कर रही हूँ | वो नहीं आया |

अगले दिन मैं साधारण सा सलवार सूट पहन के ऑफिस पहुंची | आज फिर वो लंच में हमें घूरता हुआ दिख गया | मन हीं मन अफ़सोस हो रहा था कि काश आज कल जैसे कपडे पहने होते | उस दिन के बाद से मैं रोज़ न चाह कर भी सज सवर के ऑफिस आने लगी | इस आँख मिचौली में एक महिना निकल गया फिर भी यह सुनिश्चित नहीं हो पाया कि उसे कौन पसंद है | कई बार कोशिश की कि अकेले कैंटीन जाऊं पर शिखा की बच्ची साथ छोडती ही न थी जैसे कंपनी ने उसे इसीलिए रखा है कि मेरे पीछे पीछे घूमें |मेरे हर गतिविधि पर निगरानी रखे |


सुमित से मेरे झगड़े बढ़ते जा रहे थे |उससे दोस्ती बनाय रखना मुस्किल जान पड़ रहा था | सुमित हैन्सम है ,स्मार्ट है और होशियार भी पर वो इतना घमंडी और स्वार्थी होगा यह नहीं मालूम था | मैं अपने ऑफिस में सबसे ज्यादा सुंदर हूँ और ऑफिस का सबसे स्मार्ट लड़का हीं मेरा ब्याय फ्रेंड हो यही सोचकर उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढाया था | हर समय अपनी मनमानी करता रहता | एक नम्बर का जिद्दी लड़का है वो | मुझे जैसे खेलने की चीज़ समझता हो | उसके बर्तावों से मेरे स्वाभिमान को बहुत ठेस पहुंची थी | मैं उससे दोस्ती तोडना चाहती थी पर समझ नहीं आ रहा था कैसे |

एक दिन सुमित बोला - "चलो ३-४ दिन के लिए मनाली चले | जबरदस्त बर्फ़बारी हो रही है वहां | मैंने इनकार किया पर वो कहाँ मानने वाला था | उसे भी महसूस होने लगा था कि मै उससे दूर भागना चाहती हूँ इसलिए पहले से ज्यादा प्यार जताने लगा था | शायद मनाली भ्रमण इसी कड़ी का हिस्सा था | दो दिन के बाद दोपहर को सुमीत और मैं मनाली जाने के लिए ऑफिस से सामान लेकर नीचे उतरे | मैंने देखा कि वही लड़का जो कैंटीन में मुझे घूरता रहता है रिसेप्सन के सामने सोफे पर बैठा है | सुमित मेरा हाथ थामे हुए था | मैंने झट से अपना हाथ छुड़ाया और इशारे से उसे देखने लगी कि वो मुझे निहार रहा है या नहीं | वो हमेशा की तरह उसी अंदाज से मुझे देख रहा था तभी सुमित ने मुझे बांहों में भर लिया | उसे ये बिलकुल अच्छा नहीं लगा | मैं भी सुमित के इस दिखावे से तंग आ गई थी | मन में ऐसा विचार आ रहा था कि वो आय और मुझे सुमित के बांहों के कैद से मुक्त करा दे |

बस में सुमित अपनी बकवास करता रहा |मै खिड़की से बाहर देखती रही और सोचती रही - सुमित मेरा ब्वाय फ्रेंड है यह वर्तमान है ,निश्चित है ,सच है | वो लड़का शायद मेरा दोस्त बन जाए यह भविष्य है ,अनिश्चित है | मैं क्यों निश्चित को छोड़ कर अनिश्चित के पीछे दौड़ना चाहती हूँ | वो सुमित सा हैन्सम भी नहीं पर इतना बुरा भी नहीं और रंग रूप हीं सब कुछ नहीं होता | मैंने देखा है उसके आँखों में सच्चाई है ,चहरे के भावों में गंभीरता है | वो सुमित सा बिलकुल नहीं | क्या होगा अगर उससे दोस्ती नहीं भी हो पाई तो | मै कोई कोमल बेल तो नहीं जिसे सीधे खड़े रहने के लिए किसी ना किसी सहारे की आवशयक्ता हो | बहुत देर तक अंतर्द्वंद चलता रहा |आखिरकार दिल ने फैसला किया | मैंने उस लड़के का नाम प्यार से जानू रख दिया !!!

संकल्प में बड़ी शक्ति होती है | इसका असर भी जल्द दिखने लगा | एक दिन हम लंच कर रहे थे कि जानू ठीक मेरे सामने वाले टेबल पर बैठ गया | वो न तो कुछ खाने के लिए लाया न पिने के लिए | बस बैठा मुझे निहारता रहा | करीब दो-ढाई महीनों में पहली बार उसने मेरी आँखों में झाँका | मैं उसे देखती रही वो मुझे | मानो कह रहा हो "तुम कहाँ चली गई थी ,तुम्हे देखने के लिए मेरी आँखे तरस गई थी |" मुझे सुमित के साथ देख कर उसे बहुत दुःख हुआ था |उसकी आँखों में वो उदासी साफ झलक रही थी | उसके प्यार की आग मध्यम पड़ गई थी | आज मै फिर से उसके हृदय को शोलो से भर देना चाहती थी | खाना ख़त्म होते ही जूस लेकर बैठ गई और धीरे - धीरे थोडा थोड़ा करके पिने लगी |मेरे साथ के सब लोग चले गए |बस मैं और शिखा रह गए | जूस ख़त्म होते हीं आइसक्रीम ले आई |मैंने शिखा से कहा जानू मुझे पसंद करता है तुम्हे नहीं "|
शिखा - " कौन जानू ?"
मेरे सपनो का सौदागर जो सामने बैठा है |
शिखा - "वो तुम्हारा जानू कब से हो गया ?"
आज से , अभी से | वो मेरा जानू और मैं उसकी जानेमन ! शिखा अब और वहां न ठहर सकी | नागिन सी फुसफुसाती चली गई | जब जानू उठकर पानी पिने लगा तो मै भी हाथ धोने के लिए बेसिन की तरफ बढ़ चली |
मेरा दिल जोर जोर से धक-धक करने लगा | वो कभी भी मेरी राह रोक कर अपने प्यार का इज़हार कर सकता था | उसके बगल से गुजरते वक्त तो जैसे मेरी साँस हीं रुक गई थी | जानू कुछ बोला नहीं | बस निहारता रहा |


शिखा इस कदर नाराज़ हो गई कि मुझसे बात तक करना छोड़ दिया | उसे लगता था मैंने उसके प्यार को छिना है | वह अब मेरे साथ खाना खाने नहीं आती | ना आती ना आये | यहाँ कौन मरा जा रहा है उसके लिए | मैंने सुमित से भी आखिरकार खुद को आज़ाद कर लिया | शिखा और सुमित ने ऑफिस के सारे लोगो को भड़का के मेरे खिलाफ कर दिया |मैं बहुत दुखी और आहात थी | इधर जानू भी बस घूरता रहता कहता कुछ नहीं | कभी कभी उस पर इतना गुस्सा आता कि जाकर एक थप्पड़ लगाऊँ और बोलूं कि तुम्हे किसी के अरमानो से खेलने का कोई हक नहीं | अगर बोलने की हिम्मत नहीं है तो मेरी तरफ देखना भी बंद कर दो | ऑफिस में बस एक महेंदरजी थे जो मुझे समझते थे | मेरे से उम्र में १०-१५ साल बड़े थे फिर भी उनका साथ मुझे अच्छा लगता है | उनके जीवन के अनुभवों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है और वो औरो की तरह मेरा मजाक नहीं उड़ाते | मैं उनके साथ कैंटीन आने-जाने लगी | शायद जानू कंपनी के किसी दुसरे ऑफिस में चला गया था | अब वो महीने में एक दो बार हीं दिखाई देता | हाँ पर जब भी आता उसकी नज़रे मुझे हीं तलाशती रहती |




मुझे समझ में नहीं आ रहा था की क्या करूँ | मैं आगे बढ़ के दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ा सकती थी | सुमित के साथ ऐसा कर के आज तक दर्द सह रही हूँ | आखिर क्या वजह हो सकती है | क्या वो भीरु किसम का इंसान है | दिल उसके बारे में कुछ भी बुरा नहीं सुन सकता | खुद की भी नहीं | यह भी हो सकता है कि मैं बहुत सुंदर और मॉडर्न दिखती हूँ और उसे लगता हो मैं उसके पहुँच से बाहर हूँ | किसी तरह मेरा मोबाइल नंबर या इ मेल उसके पास पहुँच जाय तो वो बात आगे बढाए | मैंने उसे ऑरकुट और फेसबुक पर बहुत ढूंढा पर मिले कैसे ,नाम तक तो पता नहीं उसका |


एक- डेढ़ महीने वो फिर नहीं दिखा | सुना है रोने से मन हल्का हो जाता है | इतना रोया कि आंसू ख़त्म हो गए और साथ ही उसको दुबारा देखने की उम्मीद भी | समय के साथ समझौता करके मैं जीना सीख हीं रही थी कि अचानक वो फिर दिखा | मेरे हीं बगल में खड़े होकर मुझे सारे कैंटीन में तलाश रहा था | सच में उसे कभी एहसास हीं नहीं हुआ कि मैं उसके कितने करीब हूँ | तीन चार दिन दिखा और फिर गायब हो गया | मैं जब भी उसे भूलने की कोशिश करती वह आकर घावों को कुरेद जाता | ठहरे पानी में कंकड़ मार जाता और मैं लहरों के भंवर में उलझ के रह जाती |

कुछ दिनों के बाद जब मैं महेंदरजी के साथ लंच कर रही थी तभी उसके तीन चार दोस्त मेरे टेबल से सटे टेबल पर आकर बैठ गए | उसके दोस्त तो यहाँ बैठे है पर वो जूस काउंटर पर क्या कर रहा है ? काफी देर से वही खड़ा था | शायद मेरा इन्तजार कर रहा हो | मैं और ना ठहर सकी ,उठकर जूस के काउनटर पर पहुँच गई और मैंगो शेक देने को कहा | एक - दो पल के लिए रुकी , शायद वो कुछ कहे पर उसने तो मुंह ना खोलने की कसम खा ली थी | मैं ठहर ना सकी |बिना जूस लिए हीं लौट आई |

हिद्रय में उथल पुथल मची हुई थी | उठी और दुबारा जूस वाले के पास गई इस आश में कि शायद इस बार वो कुछ बोले | वो बुत सा खड़ा रहा | मैं जूस लेकर आई जल्दी से पिया और रोते हुए नीचे उतर गई |

इससे ज्यादा मैं क्या कर सकती थी | ना जाने कितने लड़के कितनी लड़कियों को घूरते रहते है | हर लड़की मेरी तरह बेचैन होकर आहें तो नहीं भरने लगती फिर मैं ऐसा क्यों कर रही हूँ ? सुमित और शिखा को दिखाने के लिए या सुमित की खाली जगह भरने के लिए या मैं सच में उसे प्यार करती हूँ ? कोई तो जा के उससे ये कह दे की आकर मेरा हाथ थाम ले या अपनी नजरो की तीरों से भेदना बंद कर दे | मैं टूट चुकीं हूँ | अब और सहन नहीं होता |

Hindi Love Stories - tum kab bologi  by Nishikant Tiwari

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