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Saturday, July 12, 2014

तीन नमूने

कॉलेज के नमूनो में था नंबर पहला,दूसरा व तीसरा
गोबर के ढ़ेर से निकले ,झा,ठाकुर और मिसरा
कॉलेज की माल तम्मना के लट देख मिसरा को डर लगता है
ठाकुर को उसपे डायन चुड़ैल का असर लगता है
ज्ञानी झा कहते है ई तो शहर का फैशन है
क्या गाँव में नहीं रचाते मेहंदी,लगाते उबटन है ?

जाने किस युग में अवतरित हुआ ये ब्रह्मचारी
मिसरा कॉलेज की लड़की को कहता है नारी
मूरख जेट के जमाने में चला रहा बैल गाड़ी
आज दुशाशन मिल भी जाए, कहाँ मिलेगी खींचने को साड़ी
माइक्रो पहन के कहती है मैं हूँ बड़ी शर्मीली
अगर बेशर्म हो जाए तो पैंट हो जायेगी गीली  !!











मिसरा रोज़ चंदन घीस रहा, भोलेनाथ आप से हो जाएँ
बोले प्रभू -पर इस जमाने में पार्वती कहाँ से लाएं ?
गलती से पड़ क्या गया स्वेता के सैंडल का हिल
मिसरा के घायल हुए दोनों पाँव और दिल
उसने हमदर्दी में बातें क्या कर ली दो - चार
बटुक महाराज को हो गया उससे प्यार

एक दिन तिलक लगा के बोल बड़ा दिल का हाल
अच्छे हो पर अभी बच्चे हो सुन हुआ मुंह लाल
ये सारे आशिक अपनी मर्दानगी कैसे जताते है
क्या इसीलिए वे इन्हे अँधेरे कोने में ले जाते हैं ?
सपना चूर हुआ,बेचारे मिसारा का गया दिल टूट
इस गम में कई रात वो रोता रहा फूट-फूट ।

ऐसे मर्द भी होते है जो लड़की के नाम पे रोते हैं !!
हम ठाकुर हैं ,हम लड़की पटाते नहीं उठा लेते है
हमारे यहाँ तो लड़कियां नाचती है नोट पर
जो नहीं नाचती, उन्हे नचाते है बन्दूक की नोक पर
हमारे डर से इस कदर काँपता है पूरा लखनऊ
पंक्षी पर नहीं मारता ,बिल्ली तक नहीं करती म्याऊ ।

एक दिन मीनी ने आवाज दी तो ठाकुर चौंका
लड़की से बतियाने का था पहला मौका
लटपटा गई जबान, काँपने लगा थर थर
कहो मीनी बजाय क.. कमीनी बोल पड़ा घबराकर
मीनी ने फिर ऐसा मारा खींच के चाटा
5 फुट का ठाकुर और भी हो गया नाटा ।








झाजी दिल नहीं दिल की बोरी लाए थे गाँव से लाद
कॉलेज में छीट रहे थे ऐसे जैसे खेंतो में खाद
झा ने खुद नहीं था पहले कभी कम्प्यूटर देखा
आओ तुम्हें माऊस चलाना सिखाता हूँ रेखा
बहाने से दिन भर हाथ पे हाथ रख मज़ा लूटा
शाम को पता चला तो पाण्डे  ने खूब कूटा ।

मेरा प्यार रूठा, आईआईटी छूटा ,इसे कहते होनी
कम से कम तुम तो मेरी हो जाओ सलोनी
कसम से हम तुमसे बहुत करते हैं प्यार
सच में  मर जाएंगे जो तूने किया इनकार
हम !! क्या अपने साथ लाये हो पूरा गाँव ?
अंकल कहीं और जाके फेको अपना ये दाँव ।

तुम पैदा हुई तो बेबी, बड़ी हुई तो बेबी और हम अंकल ?
हाँ अंकल,बकवास बंद कर और पतली गली से निकल
गुस्से से भरकर झा ने जैसे ही उसकी बाह मरोड़ी
पता नहीं कहाँ से एक टीचर आ गई दौड़ी दौड़ी
पूरे कॉलेज के सामने बनना पड़ गया मुर्गा
कॉलेज की सारी लड़कियाँ बहने हैं ,हैं माँ दुर्गा |

चालबाज निकला चम्पारण का चंपू बिहारी
कविता सुना सुना बाजी मार ले गया तिवारी
तम्मना को उसमे क्या दिख गया ख़ास
सारा दिन तो करता रहता है बकवास
रास लीला देख तीनो के छाती पर सांप लोट रहे है
कैसा इसका पत्ता काटा जाए सोच रहे हैं !!

Nishikant Tiwari

Funny hindi poem

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Sunday, February 17, 2013

प्यार की मिठाई या मिठाई से प्यार !!

तुम मिले तो दिल मिले
नाच रहे है बल्ले बल्ले
जश्न मनाये आओ खाए मिल रसगुल्ले ।

जी जान से मुझपे मरती है
पर शक भी कितना करती है
जिसे समझ रही जलेबी असल में इमरती है ।

जिंदगी के सौ जंजाल सौ बखेड़े
रास्ते है कठिन टेढ़े मेढ़े
ऐसे में तेरे बोल लगते मथुरा के पेड़े ।

मुस्कुरा रही मंद मंद है
क्या कोई लल्लू आ गया पसंद है ?
या चुपके चुपके खा रही कलाकंद है |

आँख मेरी फिर भर आई
तूने जो की मुझसे बेवफाई
अकेले अकेले खा रही रसमलाई !

कंगले है सब,बस एक वही अमीर है
जिसकी ऐसी तक़दीर है
कि खाई तेरे हाथ की खीर है ।

खुशामद कितनी करू, क्या चाटू तलवा ?
कहा तो तू लड़की नहीं जलवा है जलवा
अब तो बता दे कहाँ छुपा रखा गाजर का हलवा !

बात मेरी कभी तो लो तुम सुन
लाए गुलाब, क्या करूँ मैं इससे दातुन ?
इससे तो अच्छा ले आते गुलाब जामुन ।

ना कोई गलती या बात बड़ी है
नाराज़ है ,आज फिर मुझपे बिगड़ी है
लाये माल पुआ ऊपर नहीं रबड़ी है ।

समझ रहा था इसको बुद्धू
झाँसे में आ गया रे गुड्डू
बहला फुसला के छीन ली मोतीचूर लड्डू ।

जान मेरी तू लाखो में एक है
जितनी सुन्दर दिल उतना ही नेक है
क्या कहूँ डोडा बर्फी या मिल्क केक है ।

उसे कातिल कहूँ या काजू कतली
गुजरिया है खोया गुजिया
बबुनिया मीठी जस बुनिया ।

मादक बड़ा ये मोदक है
मलाई है, लोग कहतें हैं माल आई है
सोहन हलवा है , उसके आते ही सब हल हुआ है।

एक दिन बोली, सुनो मेरे सोनू मेरे हमदम
आती है शरम फिर भी कहते है हम
तुम मेरे बालूशाही और मैं तेरी चम् चम् ।

शादी को हाँ कह दी कि आएगा बहुत मज़ा
बारात सजेगी,धूम मचेगी , बजेगा बैंड बाजा
सज के आयेंगे दुल्हे राजा साथ में सिलाव खाजा !!!!!!

By Nishikant Tiwari - Meethi Haasya Kavita

Thursday, October 11, 2012

मैं निपढ मुर्ख बाल ब्रह्मचारी

हर शाम जब  भी  मैं  छत  पे  टहलने  जाता
उसे  सामने  की छत  पे  मटकते    पाता
कभी  शर्मा  के  देखती,  कभी  देख  के  शर्माती
किताब  लिए  मुझे  देख  हमेशा कुछ  रटती  रहती |

मैं  था  निपढ  मुर्ख बाल  ब्रह्मचारी
वो कहाँ  कोई  साधारण  नारी
लड़की  देख  तो  मुझे  आये  पसीना
मोहल्ले  की कोई  छोरी  हो  या  करीना  कटरीना |

पागल होकर  मेरे  प्रेम  में
फिट  किये  बैठी  थी  मुझे  आँखों  के  फ्रेम  में
मुझे  तो  कबड्डी  तक  आती  न  थी
और  खींच  रही  थी  ओलम्पिक  के  गेम  में !

मन  ही  मन  मै  भी  उसपे  मरता  था
पर  आते  देख  घबरा  के  राह  बदल  लिया  करता  था
एक  दिन  बोली  रोक  के  मुझे  बीच  बाज़ार  में
तुझमे  कुछ  कमी  है  या कमी  है  मेरे  प्यार  में ?

क्या  कहूँ  लड़की  थी  या  परी
पर  मुझ पे  थी  क्यों  मिट - मरी
आखिर  मैंने  था क्या किया
जो  मानने  लगी  थी  पिया ?

अब  तो  आईने  में  जोश  से  बांहे  फुलाता
पर  छत  पे  जाते  हीं फिर  बिल्ली  बन  जाता
हो  सकता  सब  अगर  बस  जोश से
तो  गधे  जीत  कर  निकलते  घोड़ो  की  रेस  से |

एक  दिन  हिम्मत  करके  मैंने  भी  किये  इशारे
पर  हम  तो  नौसिखिये   थे  इस  खेल  में  प्यारे
पता  नहीं  क्या खोट  हो  गई
वो  हंस  हंस  के  लोट  पोट  हो गई |

वो  बेचारी  कितनी  तड़पती, कितनी  रोती  थी
पर  सामने  जाने  की  मेरी  हिम्मत  ही  न  होती  थी
कितने  महीने  खुद  को  वो  ऐसे  ही  तडपाती
अब  तो  पेड़  पर  रहती  कबूतरनी  भी  बन  गई  थी  दादी |

राखी  के  दिन  जाने  क्यों  गुस्सा  थी  अम्मा
तुझसे  कोई  मिलने  आया  है  नालायक  निक्कमा
मेरी  तो  पतलून  उतर  गई  थी
राखी  का  थाल  लिए  वो  सामने  खड़ी  थी !

एक  टक  देखी  मुझे  गौर  से
अह  फिर  बाँध  दी  राखी  जोर  से
आखिर  उसे  क्यों  ना  लगती  मिर्ची
पिताजी  उसके  बन  सकते  थे  ससुरजी |

रोज़  उसे  छुप  छुप  देखा  करता  हूँ
उस  दिन  को  याद  करके  आंहे  भरता  हूँ
वो  भी  इशारे  करती  है
मुझ  पे  नहीं  मेरे  बाजू  वाले  पर  मरती  है !!
Nishikant Tiwari - Hindi Comedy Poem

Wednesday, August 12, 2009

Hindi comedy poem bhrahm bhoj

आप ने दिया इतना सम्मान
कि याद करते हीं मुंह में आ जाता है पान
अब तक नाच रहा है जिह्वा पर खीर का स्वाद
सदा सुखी रहो है दरिद्र का आर्शीवाद |

छोले ,पूरियाँ ,आचार वो रायता
भूले कैसे पालक-पनीर का जायका
पर क्या कहे हुआ कितना अफ़सोस था
मन तो भरा नहीं ,पेट ठूस के हो गया ठोस था |

टूट गया धर्म मेरा पहली बार इस भोज में
ना बाँध के ले जा सका कुछ भी मैं संकोच में
पर चिंता मत कीजिये हमारा कम हीं पाप से मुक्ति दिलाना है
तो बस इतना बता दीजिये फिर कब भोज पे आना है |

Nishikant Tiwari

Tuesday, June 23, 2009

फेर लड़कियों के नाम की मनका

जलता रहा है दिल कब से, अब सिर्फ राख बाकी है
मिल ना सका प्यार जो उसकी अभी भी तलाश बाकी है
यू नहीं गुजारते रात जाग कर
और नींद में भी चीखते रहे
मुझे प्यार कर ,मुझे प्यार कर
दुरिया मिटाने की हर संभव प्रयास जारी है
हर लड़की लगती खुबसूरत हर लड़की लगती प्यारी है
फिर भी कोई पास ना आए तो दिल क्या करे,
टकटकी लगा कर देख रहे सबको हम खड़े खड़े

जाने कितनी गालियाँ पड़ी और पिट चूका कई बार है
पर प्यार के लिए हर जिल्लत, हर मार करनी पड़ती स्वीकार है
ऐ दोस्त मेरे तू गम ना कर वो दिन कभी तो आएगा
कोई तो देख तुम्हे शर्माएगी जब तू देख उसे मुस्काएगा
मत सोचो गोरी है या काली, सुंदरी के कई रूप है
जो मिल जाए अपना लो ,सब एक ही चाहत की धुप है
अर्जुन की तरह तुम्हारा लक्ष्य केवल पाना प्यार है
चाहे जो भी करना पड़े तुम्हे अगर सब स्वीकार है
तो जान लो ये कि तेरा इतना मेहनत करना बेकार है
आज कल प्यार बिकाऊ है ,सारी दुनिया खरीदार है

अगर पैसा है ,बना सकते हो बातें गोल गोल
तो तेरी भी बज सकती है फटी ढोल
खुल के बोली लगा दे किसी के नाम की
तुझे ज़रूर मिलेगी तेरे काम की
क्या कहा, ना बातें बड़ी नाही पैसा है
तो तू भी मेरे जैसा है
आ बैठ , फेर लड़कियों के नाम की मनका
बन के दिखाओ विश्वामित्र तब आएगी मेनका


Nishikant Tiwari

Wednesday, September 19, 2007

झाँकी हिन्दुस्तान की

सर पर जूता पाँव में टोपी,
खोपड़ी ऊलटी हर जवान की,
सफेदपोश में काला काम करे हम,
नीयत हर बेईमान की,
माता-पिता बेघर हुए,
बेटा रुप धरा शैतान की,
कदम कदम पर चोर लुच्चके,
ये झाँकी हिन्दुस्तान की ।
.
हर साधु में चोर बसा है,
बस नज़र चाहिए पहचान की,
मित्र बन चल दिखाए,
शराबे समा हैवान की,
शैतानों की भीड़ लगी है,
सुरत दिखे नहीं इन्सान की,
ये झाँकी हिन्दुस्तान की ।
.
नगर पालिका की गाड़ी नहीं,
किस्मत कचड़ा बनी हर कदरदान की,
सच के मुँह पर ताला पड़ा,
झुठे कौवे शान बढाए न्यायिक संस्थान की,
पाड़ा भी अब पण्डित बना,
बात सुनाए वेद पुराण की,
ये झाँकी हिन्दुस्तान की ।
.
नेताजी सब नर्तक बने,
खिंची टाँग हर सुर गान की,
पठन पाठन संग प्रेम की शिक्षा ,
नीति हर विद्वान की,
अब याद आए कैसे मुझे मुस्कान की,
जब ऐसी झाँकी हिन्दुस्तान की,
जब ऐसी झाँकी हिन्दुस्तान की ।


Nishikant Tiwari

Wednesday, September 5, 2007

पवन भँवरा टकरार

पवन ने क्या कह दिया झुक गईं शर्म से सारी कलियाँ
भुन भुनाने लगा भँवरा देने लगा गालियाँ
उसकी बीबी तो एक भी नहीं बस सालियाँ हीं सालियाँ ।
.
पवन: अरे ओ आवारा भँवरा, रस चूसने वाला
बुरी नज़र वाले तेरा तो मुँह हीं नहीं सारा बदन काला
नशे में झुम रहा शराबी,शर्म नहीं आती तुम्हें ज़रा भी
दिन रात फुलों के बीच रहकर
तू उनकी ही सुगंध में सड़ रहा है
भगवान तुम्हें बचाए ना तू जी रहा है ना मर रहा है ।
.
भँवरा: जो भी रास्ते में आए, या तो झुका दे या फीर तोड़ दे
कलियों फिर तुम्हारी बहियाँ कैसे छोड़ दे
उड़ा दे सारी पंखुड़ी एक पल में कर दे जवान से बुढी
यह पवन है पावन नहीं
इसमे बस भरा है अवगुण भुन भुन भुन भुन....................
.
पवन
: काले कलुठे भँवरे तुझ पर तो कोई रिझती नहीं
फिर क्यों कभी सिटी मारता कभी गाना गाता है
जा बेवकूफ़ो की लाइन में खड़ा हो जा
क्यों लाइन मारता है ।
.
भँवरा: हर कली तू बनना चाहता यार है
शायद मानसिक रुप से बीमार है
कहाँ कहाँ कितने जूते खाएँ हैं
पर तू फिर भी आदत से लाचार है ।
.
कलि: क्यों लड़ रहे हो इनसानों की तरह
कच्छा पहन अखाड़े में खड़े पहलवानों की तरह
जहाँ पवन ना बहे और भँवरा ना गाए
उस बगिया में कौन आएगा
तुम दोनो यूँ लड़ते रहे तो मुझसे दिल कौन लगाएगा ?
.
पवन: पीछे हट जा भँवरे अब मेरी बारी है
भँवरा: नहीं इससे मेरी पहले से यारी है
तन गए दोनो फिर खरी खोटी सुनाने की तैयारी है
जंग पहले भी ज़ारी थी जंग अब भी ज़ारी है ।


Nishikant Tiwari

Monday, August 27, 2007

घड़ी देख कर


जब मैं पैदा हुआ लोग खुश होने से पहले भागे,
समय नोट करने घड़ी देख कर,
रोज़ पिताजी उठते थे घड़ी देख कर,
दफ़तर जाते घड़ी देख कर,
शाम को माँ बोलती तेरे पिताजी अभी तक नहीं आए घड़ी देख कर,
पिताजी घर आते घड़ी देख कर,
चाय पीते घड़ी देख कर,
सामाचार सुनते घड़ी देख कर,
खाना खाते घड़ी देख कर,
और सोने भी जाते तो घड़ी देख कर ।
.
मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो स्कुल जाने लगा घड़ी देख कर,
लंच और छुट्टी होती घड़ी देख कर,
एक दिन घर देर से पहुँचा तो माँ बोली इतनी देर कहाँ लगा दी घड़ी देख कर,
मेरे पास तो घड़ी हीं नहीं है फिर घर कैसे आउँ घड़ी देख कर,
मिल गई मुझे एक नई घड़ी,
सभी खुश होते मुझे देख कर घड़ी घड़ी,
पर मैं खुश होता भी तो घड़ी देख कर ।
.
बड़ा हुआ रोज़ इन्टरभ्यू देने जाता घड़ी देख कर ,
नौकरी मिली भी तो आते जाते ट्रेनों की सुची बनानी थी घड़ी देख कर,
बात शादी की चलाई गई शुभ घड़ी देख कर,
और जब मण्डप में बैठा तो पण्डितजी बोले
तेरी शादी भी शुरु होगी घड़ी देख कर ,
मेरी पत्नी कितनी भाग्यवान थी ,
जब आती ना थी देखने घड़ी तो परेशान कैसे होती घड़ी देख कर ।
.
हर घड़ी मैं बेचैन रहता था,
और बेचैन हो जाता घड़ी देख कर,
मन बहलाने के लिए सिनेमा हाल गया,
तो कर्मचारी बोला शो अब शुरु हीं होगा घड़ी देख कर,
घड़ी देखते देखते मेरा सर घड़ी सा घूमने लगा,
बीमार पड़ा डाक्टर के पास गया,
उसने नब्ज़ पकड़ी और बोला घड़ी देख कर,
आपको बुखार है हर दो घण्टे पर दवा खाइएगा घड़ी देख कर,
जिस कारण बीमार पड़ा,
भला ठीक कैसे हो सकता था उसे देख कर,
लोग कहने लगे इसके मरने का टाइम आ गया है,
और आज मर भी रहा हूँ तो घड़ी देख कर ।

Nishikant Tiwari

Thursday, August 16, 2007

जोगीड़ा

जोगी जोगी देख रे बबुआ,
बड़का बना ई भोगी,
मीरा मीरा जाप करे ,
श्याम ना इसे सुहावे,
मंत्र जपे ना ध्यान करे,
गीत प्रेम लीला के गावे,
नारी देखो आगे आगे,
काहे जोगीड़ा पीछे भागे,
कहे कि देवी दर्शन भयो है,
प्रेम सुधा बरसा दे ।
.
वन वन काहे भटके रे मनवा
चल नगरी में प्यारे
मिली पुआ पूरी ठूँस ठूँस के
पाँव पुजइहें हमारे
घर घर जाके झुठा जोगीड़ा
काहे माई माई चिल्लावे
इ तो अपने बाप को डँसे निगोड़ा
माई के बेच के खावे।
.
देख चोर जोगीड़ा के दाढी में तिनका
रतिए रतिए खेत चर जाए
छुप छुप चुगे दाना दुनका
बड़का बड़का स्वांग भरे इ
बड़का जाल बिछावे
सब मुरख मिली फ़ँसे जब
मन मन ताली बजावे
सुन प्रशंसा बड़ तपसी के
जोगीड़ा जल भून जाए
नाम तो जपे आलोक निरंजन
आ सब के परलोक पहुँचाए ।
.
काम पड़न वाह जोगीड़ा
गदहे के बाप बनाए
आ काम हो जावे पर मारे दुलत्ती
जोगीड़ा खुद गदहा बन जाए
ओकरा मन में पाप पले ना संतन की बूटी
गुण तो एक्को देखे ना भैया
बस त्रुटि हीं त्रुटि
समझ तू बबुआ इ जोगी का फेरा
जोगी नहीं इ मनवा मेरा तेरा ।

Nishikant Tiwari

वाह रे होली



भांग की गोली खाए है सब के सब बौराए है,
अपने गालों को खुद रगड़े ,
कहे कि उनसे रंग लगवाएँ है,
कुछ भूत बने कुछ कीचड़ में नहाए है,
पगला पगला कहे एक दुसरे को,
खुद हीं सब पगलाए है ।
.
उठा पटक, हो जाए गारा-गारी,
अकेला है फेको नाले में,
बाद में हो चाहे मारा मारी,
फोड़ दो शीशे सभी घरो के,
घूस जाओ जो ना निकले बाहर,
कर दो ऐसा धूम धड़ाका,
घर हो जाए नरक से बदतर ।
.
सबके मुँह में पेंट पोतो ,
पिलाओ ज़बरदस्ती भाँग शराब,
दो दिन तक घर ना पहुँचे
हालत हो जाए इतनी खराब
छिन लो सारे रंग बच्चों से,
कर दो खूब पिटाई
रंग दो उन सभी घरों को,
हुई जिनकी नई पुताई।
.
अबीर के समय में भी रंग फेको,
खराब कर दो नया कपड़ा,
लाउड स्पीकर इतना तेज बजाओ,
कि फट जाए कान का चदड़ा,
इससे भी ना मन भरे,
तो मार दो किसी को गोली,
कोई बुरा कैसे मानेगा,
अरे आज तो है होली !!!


Nishikant Tiwari

परलोक में परिलोक

एक बार मैं मर कर परलोक गया
परलोक क्या परिलोक गया
देखा अप्सराएँ नाच रहीं है
इन्द्र व अन्य देवगण सोमरस का पान कर रहे थे
मै भी रुप रस का प्याला पीकर नाच उठा
घूमते घूमते मुझे इन्द्र मिले
बोले स्वर्ग में आपका स्वागत है
तो कैसा लगा स्वर्ग ?
अच्छा है पर धरती सा नहीं है ।
देखिए आप स्वर्ग का अपमान कर रहे है
यहाँ अप्सराएँ है,सोम रस है,चारो ओर सुख का माहौल है
वहाँ क्या है?
मैं बोला - अप्सराएँ तो धरती पर इतनी है कि स्वर्ग में अटे हीं नहीं
पता नहीं कब से एक हीं जैसा नृत्य और सगींत में डुबे हुए है
धरती पर तो हर तीन महीने में फैशन बदल जाता है
सोमरस छोड़िए वहाँ तो बियर, विस्की, शेम्पेन ,रम ,दारू
और हाँ ताड़ी भी तो मिलती है
स्वर्ग में सुख का नहीं भय का माहौल है
आप दानवों को पराजित करने के लिए धरती से
कुछ आधुनिक हथियार क्यों नहीं ले लेते ।

क्या आपने माँ के गोद में बैठ कर दुध भात खाया है ?- नहीं
क्या आपकी माँ ने आपको लोरी गा के सुलाया है ?- नहीं
क्या आपने लड़कियों को लड़को के वस्त्र में देखा है ?- नहीं
क्या आपको मालूम है पहला प्यार क्या होता है ?- नहीं
धरती पर तो चित्र तक चलते है
प्यार से हम उसे सिनेमा कहते है
वहाँ तो चैरासी प्रकार के प्राणी रहते है,यहाँ कितने है ?
अ..ब.......
धरती तो नीच से नीच का भी भार वहन करती है
पुत्र भले कुपुत्र हो जाए माता कुमाता कैसे हो सकती है ।
यह सब सुन कर इन्द्र बोल उठे-काश मैं भी मनुष्य होता
काश मैं भी धरती पर रहता !

तभी एक दूत ने दी आवाज़ चलो तुम्को बुला रहे है यमराज
यमराज बोले हे नर आप समय से पहले हीं गए हैं मर
अतः धरती पर लौट जाँए कृपा कर
जिस दूत ने इसके प्राण हरे है उसे दुगने कोड़े लगाए जाए
मैने पूछा - दुगने कोड़े क्यों ?
पहली गलती तो यह कि तुम्हें असमय हीं मारकर लाया है
दुसरी गलती यह कि तुम्हारे जैसे पापी को नरक ले जाने
के बजाए स्वर्ग ले आया है
सबको अलविदा कहकर वापस शरीर में आ गया
और बैठ गया उठ कर
माँ बोली-कितने देर से जगा रही थी
उठ क्यों नहीं रहे थे इतने देर से मर रहे थे क्या
हाँ पर आपको कैसे पता !!!

Nishikant Tiwari

Tuesday, August 14, 2007

सच्चा देश भक्त

खादी धोती खादी कुर्ता खादी रुमाल,
खादी झोला खादी टोपी रौबदार चाल,
बीच बाज़ार घूम रहे थे चाचाजी क्रांतीकारी,
पहुँचे मिठाई की दुकान पर जब भुख लगी भारी,
डाँट कर बोले- ये तुम मिठाई बना रहे हो ?
कुछ खुद खा रहे हो कुछ मक्खियों को खिला रहे हो ।
.
हलवाई - जब रहे आप लोगों की दुआएँ तो क्यों ना हम मिठाई खाए,
और ये मक्खियाँ तो स्वतंत्र देश के प्राणी आजाद हैं,
ईनके मिठाईयों पर बैठने से इनका और भी बढ जाता स्वाद है,
तो आप हीं बताइए इसमें मेरा या फिर मक्खियों का क्या अपराध है,
इससे पता चलता है कि मिठाईयाँ अच्छी बनी है,
आप आए मेरे दुकान पर किस्मत के धनी है ।
.
ये देखिए ये जलेबी ये बर्फ़ी ये लड्डू और ये रसमलाई है,
तो कहिए जनाब क्या देख कर आपकी लार टपक आई है ,
बोले इसमें सबसे सस्ती कौन है,
जनाब जलेबी पहले तो इसे गोल गोल घुमाओ ,
और खौलते तेल में पकाओ,
फिर चासनी में डुबा-डुबा के निकालो औए मज़ा लेते जाओ ,
तभी टपक पड़ी चाचाजी की लार,
और सारी जलेबियाँ हो गई बेकार ।
हलवाई बोला- अब तो आपको हीं सारी जलेबियाँ खानी पड़ेंगी,
अगर ना खा पाए तो दो्गुनी किमत चुकानी पड़ेगी,
क्योंकि अगर ना खा पाए तो यह राष्ट्रिय़ मिठाई का अपमान होगा,
आपका दुगना भुगतान देश के प्रति छोटा सा बलिदान होगा।
जैसे हीं उन्होने एक जलेबी चबाई,
दाँतों तले से करकराहट की आवाज़ आई,
बोले इसमें तो आ रहा मिट्टी का स्वाद है ।
.
हलवाई-वाह क्या बात है,
आप जैसे लोगो को हीं आ सकती जलेबी में देश की मिट्टी की महक है,
तभी तो आपकी आँखो में आ गई नयी चमक है,
सोचने लगे बेस्वाद जलेबी आखिर ठूसे तो कितना ठूसे,
देश भक्ती का चोला भी पहने रहे व धन से नाता भी ना टूटे,
मर के खाए और खा खा के मरे,
बहुत बुरे फ़ँसे आखीर करें तो क्या करें ।
.
अंत में एक जलेबी बच गई,
सोंचे जलेबी गई अगर अंदर तो प्राण जाएंगे बाहर,
देश भक्ती के चक्कर में बेमतलब जाएंगे मर,
ईज्जत जाए या धन से नाता टूटे,
अब न खाउँगा जलेबी जग रुठे या किस्मत फूटे ,
भारी मन से दिया दोगुना दाम,
और तुरन्त भागे बिना किए विश्राम,
मुस्कुरा कर बोला हलवाई,
देश के सच्चे देश भक्त को ,
सत सत प्रणाम सत सत प्रणाम ।


Nishikant Tiwari

Monday, August 13, 2007

दुगना मर्द

एक दिन बोले मेरे दोस्त तू मर्द नही है,
जो काम कर सकते है हम वो तू कर सकता नही है,
हम सब ने है एक एक लड़की पटाई,
पर तू अभी बच्चा है जा खा दुध मलाई,
मैं बोला-तुम सब ने है एक एक लड़की पटाई मैं दो पटाउँगा,
दुगना मर्द हूँ साबित कर के दिखलाऊँगा ।


सड़क किनारे एक लड़की जा रही थी,
मैंने आव देखा न ताव बस दे फेखा दाँव,
बोला-शायद आपका नाम रेखा है ,
लगता है आपको पहले भी कहीं देखा हैं,
कहाँ ? पागलखाने में,
मैं बोला-अच्छा तो आप भी वहीं थी,
नही नही मैं अपने पिछले प्रेमी से मिलने गई थी
सुन के उसकी बातों यारों खुद से कहा तुरन्त यहाँ से भागो ।
.
फिर सिनेमा हाल के सामने एक दुसरी लड़की से हाथ मिलाया,
और अपनी बदनसीबी का झुठा दुखड़ा कह सुनाया,
बोली कहानी पुरी फ़िल्मी है पर इसमें क्लाइमेक्स नही है,
मैं पूरी कहानी बनाती हूँ क्लाइमेक्स क्या होता है तुझको बताती हूँ,
पहले धीरे से मुस्काई और फिर सैंडल उठाया,
भागते भागते कलेजा पानी हो आया ।
.
बेकार मैं घूम रहा था गली गली,
मेरे घर के बगल में रहती थी एक सुन्दर कली,
एक दिन देखते हीं उसे मैने हाथ हिलाया,
पहले तो एक देखी फिर हँसी,
मैं समझ गया कि लड़की फ़सी,
देखकर मेरी चढती जवानी हो गई मेरी दीवानी
चलो एक तो पटी अकड़ से चाल हो गई मर्दानी ।
.
एक दोस्त के जन्मदिन पर जैसे हीं एक लड़की ने,
दोस्त को केक खिलाना चाहा,
तभी बत्ती हो गई गुल और केक मेरे मुँह में आया,
बिजली के आती हीं उससे आँखे चार हो गई,
वह दिलनशी दिलरुबा दिल का करार हो गई,
मैने ऊसे हीं ऊपहार पकड़ा दिया और वह मेरी यार हो गई
.
सारे दोस्तो की बोलती हो गई बंद,
बोले हम तो रह गए देवदास वह बन गया देवानंद,
एक दिन रेस्टोरेंट में मैंने पहली को बुलाया,
तो दोस्तो ने फ़ोन कर दुसरी को पता पताया ।
.
फिर क्या कहे क्या हुआ हाल,
दोनो पकड़ के खिंचने लगे एक दुसरे का बाल,
मैं सोचा ये क्या हो गया गड़बड़ घोटाला,
कहीं जीजा बनने के चक्कर में ना बनना पड़ जाए साला ।
.
एक का भाई रंगदार था तो दुसरे का बाप पुलिसवाला,
दोनो ने साथ मिल कर डाका डाला,

लोफ़र लुच्चा आवारा आज तुझे दिन में दिखाएंगे तारा,

बुझाएंगे तेरी जवानी लाएंगे तेरा बुढापा,
मार इतनी पड़ेगी चिल्लाओगे पापा पापा,
आगे
का तो आप समझ गए होंगे हाल,
मार इतनी पड़ी कि लचक गई कमर बदल गई चाल,
अब लड़की क्या उसकी परछाई से भी डरता हूँ,
आज भी सपने में पापा चिल्लाया करता हूँ ।...


Nishikant Tiwari

पत्नी बनी सजनी

सजनी सजनी कहते कहते कितने लोग बुढाए,
ना मिले सजने कबहूँ पत्नी गले पड़ जाए,
तो सोंचे चलो पत्नी को हीं सजनी बनाए,
प्रिए चलो किसी अनजान सी जगह पर लड़का लड़की बन के रहेंगे ...


क़सम खा लो कुछ भी हो एक दुसरे को ना पति पत्नी कहेंगे,
मैं तुझ पर दाने डालूँगा चक्कर तुझसे चलाउँगा,
फ़साँ के तुमको प्यार के जाल में घर वापस लेकर आऊगाँ,
बोली-हे नाथ आप जो कहेंगे वही होगी बात ।....


एक दिन टाइट जिंस पहन कर जैसे हीं निकली बाज़ार,
सीटी मार के कितने आशिक पहुँच गए जताने प्यार,
कोई कहे चल मैं तुझे सोने-चाँदी से सजा दूँ,
तो कोई कहे चल मैं तुझे शहर घूमा दूँ,
किसी ने कहा दिल तोड़ ना मेरा मैं हूँ बदनसीब,
तो कोई कहे मैं सबसे हैंडसम हूँ आजा मेरे करीब ।....


पहले ने सोने सजाया तो दुसरे ने शहर घूमाया,
तीसरे की दिल की बातें,चौथे से इश्क लड़ाया,
पति हैरान परेशान खुद को बहुत समझाया,
पर एक दिन हाथ पकड़ कर आइ लव यू बोल हीं आया
सब समझे कि आवारा है कर दी खूब धुलाई,
हाथ पाँव सब सूझ गए पकड़ ली चारपाई ,
ईधर ऊसने जाने कितने रंग बदले क्या क्या गुल खिलाया,
एक दिन मोटर वाले के साथ भागते पाया .....


मेरी पत्नी भागी जा रही है,
पकड़ो उसे मेरे यारो मेरे हमदर्द,
सब ने पकड़ने के बजाए दो दो थप्पड़ मारे,
बोले कैसा है नामर्द,
नाक कटवा दी तूने,तूने कर दी हद ....


बीच सड़क बैठ पति हाय हाय चिल्लाया,
कि पिजड़े में बन्द चिड़िया को हमने उड़ाया,
आप सब ने देखा कि कितना पछताया,
तो दूसरी तीसरी चौथी शादी रचाए,
पर कभी पत्नी को सजनी ना बनाए,
क्योंकि सजनी सजनी कहते कहते कितने लोग बुढाए,
ना मिले सजनी फिर भी पत्नी भी हाथ से जाए ।...


Nishikant Tiwari

मच्छरजी महाराज

एक दिन बोला मच्छर,
पढ लिख मैं भी हो गया हूँ साछर,
तूने बहुत मस्ती की है, बहुत खुन बनाया है,
अब मैं मौज़ करूँगा, तू बैठा रह मै तेरा खून पिऊँगा

मैं बोला-अबे मच्छर हो कर मेरा खून पिएगा,
ये तो हमारे हिन्दी फिल्मों के बड़े बड़े हिरो किया करते है,
गाना गाकर खून पीने का मेरा उनीक तरीका है,
अरे उन सब चेलो ने तो मुझसे ही सीखा है

अपने औकात मेम रह , मच्छर होकर मुझसे जबान लड़ाता है,
मुझे औकात सीखाता है , जानता नही यह मच्छरो का देश है,
यहाँ एक एक आदमी पर सै सौ मच्छर नज़र आता है,
इतने गोली बन्दूक चलते है,पर भला कोई मच्छर भी कभी मरता है,
मरते हो तुम सब वह भी कुत्ते की मौत,
मच्छर तो क्वाइल पर भी डांस किया करता है

मच्छरजी महाराज मुझे माफ़ कीजिए,
बदले में चाहे जितना खून साफ़ कीजिए,
खून पीकर बोला मच्छर,
थू यह तो बासी है,
जरूर तू भी औरो का खून पीता है तभी तो फूल होकर गया हाथी है,
ये तूम क्या बक रहे हो, लगता है आजकल मुँह नही धो रहे हो

तुम्हे मालूम होना चाहिए मच्छरो के दाँत नही हुआ करते है,
मुँह के गन्दे तो ईन्सान है तभी सुबह शाम ब्रश किया करते है,
सुनो इस बार मैं चुनाव में खड़ा हो रहा हूँ,
बस मलेरिया छाप पर ही मुहर लगाना,
नही तो सुढ घोप सारा खून चूस लूँगा,
फिर पड़ेगा जिन्दगी भर पछताना

अच्छा अब यह मेरे आरम का वक्त है हम अभी चलते है,
दिन भर आराम करो फिर रात को मिलते है ।...

Nishikant Tiwari

शादी के बाद बहुत कुछ होता है

एक पल के लिए हँसता एक पल में रोता है,
पल भर में जागता,पल भर के लिए सोता है,
शादी के पहले कुछ कुछ होता था,
शा़दी के बाद बहुत कुछ होता है ।

घर में घूसे तो उड़ जाए मेरी साँस,
आ जाए अगर पास तो बिछ जाए मेरी लाश,
इन माँ बेटी से हिटलर भी खा जाए मात,
जाने कौन सा खाती है ये च्यवनप्राश,
पर मुझे तो मिलती सुखी रोटी और चोखा है,
शादी के पहले कुछ कुछ होता था,
शा़दी के बाद बहुत कुछ होता है ।

बर्तन माँजना खाना पकाना,
पोछा लगना , कपड़े धोना और पैर दबाना,
आदमी शादी के पहले हीं आदमी रहता है,
उसके बाद बैल ऊल्लू या गद्धा होता है,
डारलिंग डारलिंग कहते थक गया तोता है,
शादी के पहले कुछ कुछ होता था,
शा़दी के बाद बहुत कुछ होता है ।

एक दिन सोते समय मैडमजी का पैर दबाते दबाते गर्दन दबाना चाहा,
तभी उसने करवट फेरी और मेरी तीन हड्डियों का हो गया स्वाहा,
दिल तो पहले हीं खो दिया था लगता है दिमाग भी अब खो दूँगा,
तीन महिने बिस्तर पर पड़े पड़े जाने क्या कर बैठूँगा,
मित्र सब समझा रहे कि जिन्दगी में सब कुछ होता है,
पर यार शादी के पहले कुछ कुछ होता था
शादी के
बाद बहुत कुछ होता है ।

एक दिन अस्पताल आकर पत्नी बोली मुझे तलाक चाहिए,
ऐसा लगा जैसे भगवान ने स्वयं प्रगट होकर कहा हो,
बच्चे तुम्हें क्या चाहिए,
खुशी से उछ्ल कर बोला- तलाक तलाक तलाक,
जाने से पहले थप्पड़ जड़ दी तड़ाक तड़ाक तड़ाक,
बकरा शादी के दिन और तलाक के दिन भी रोता है,
शादी के पहले कुछ कुछ होता था,
शा़दी के बाद बहुत कुछ होता है ।....

Nishikant Tiwari

नया फैशन

पान के छीटे जो पड़े बुरा ना मानिए ज़माना रंगीन है,
इससे तो आप लग रहें,
हसिनाओं से भी हसीन है,
जहाँ खेली जाती है होली,
यह वो सरज़मीन है,
पान के छीटे जो पड़े बुरा ना मानिए ज़माना रंगीन है ।

लोग आपको देख कर ईष्या से जल जाएंगे
नया फैसन समझ के इसे भी अपनाएंगे,
फिर ड्रेस डिजाइनर में आपका नाम भी प्रचलित होगा,
कौन मुर्ख आपको देख कर ना विचलित होगा,
आप तो बेहतर थे हीं,
पर इससे लग रहे और भी बेहतरीन है

पान के छीटे जो पड़े बुरा ना मानिए ज़माना रंगीन है ।

Nishikant Tiwari

Wednesday, July 18, 2007

टकला


रमेश भाई को जब तक हुए बाल बच्चे,
उन्के सर के एक भी बाल नही बचे,
कुछ बच्चे उन्हे टकला टकला कह कर चिढाते,
तो कुछ सर पे मार के भाग जाते ।

सारे मुहल्ले मे किस्सा मश्हुर था,
कि इन्के बाल यो ही नही उङॆ बल्की ऊङाए गये है,
बेचारे पत्नी द्वारा बहुत सताए गये है,
घर मे बीबी की डाट पडती,
दफ़्तर मे बॉस देता धमकी,
तुमसे मेरी बर्षॊ पुरानी यारी है,
वर्ना काम मांगाने वालो मे आधी लड़किय़ाँ कुवाँरी है ।

जब दाढी बनवाने सैलून जाते ,नाई भी ईन पर चिल्लाते,
ससुरजी भी कहते कि अगर तू शादी के पहले टकला हो जाता,
तो हमारे दहेज़ का खर्चा बच जाता,
जब वो बच्चो को स्कुल छोड़ने जाते ,
बच्चे ईन्हे अपना नौकर बताते,
भाई आज के फैशन और खुबसुरती के ज़माने मे गंजा होना श्राप है,
अब बच्चे कैसे बताँए कि टकला उन्का बाप है ।

एक सामाजिक संस्था तो यँहा तक कहती है,
हर टकले को शादी करने से रोका जाए ,
कहीं ऐसा ना हो यह बिमारी पीढी दर पीढी फैलते फैलते,
सारा संसार टकला हो जाये ।

ऊधर एक फिलोसोफर का कहना है ,
जिन्की सोंच गिरी हुई होती है उन्के बाल जल्दी गिर जाते है,
ऐसे पतीतो को गोली मार देनी चाहिये ,
मुझे आशचर्य है वे खुद शर्म से क्यों नही मर जाते है ।

एक बडा खुशनसीब नौजवान था मतवाला ,
सर पे थे सुन्दर बाल , साथ में सुन्दर बाला,
देख कर जोड़ी रमेश भाई ऐसे खो गये,
जैसे चलते चलते हीं सो गये,
जब बाला के बालों ने गुदगुदी मचाया,
खुद को लड़की से लिपटे पाया,
नौजवान बोला-अबे टकला हो कर लाईन मारता है,
क्यों टकला होना क्या अपराध है,
लगता है आज हीं गंजे तेरा होने वाला श्राध है ।

ईस पर रमेश भाई के खून में भी गर्मी आई,
बोले-अबे ओ खरबुजे,चुहिया के साथ नाच रहे चूजे,
भगवान करे तूझे कैंसर हो,तूझे कोढ हो जाये,
तेरे घर में आग लगे ,तूझ पर आतंकवादी का हमला हो जाए,
तू तबेले में जाकर मरे,
बच्चे तेरे सर पे तबला बजाएँ ,
जा मैं तुझे श्राप देता हूँ,
जल्द हीं तू भी मेरी तरह टकला हो जाए !!!!

Nishikant tiwari

Aab mai kaya kahu ?  हो जज़्बात जितने हैं दिल में, मेरे ही जैसे हैं वो बेज़ुबान जो तुमसे मैं कहना न पाई, कहती हैं वो मेरी ख़ामोशियाँ सुन स...