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Saturday, March 24, 2012

एक समझौता कर लेता हूँ

जब याद करके तेरा उदास मुखड़ा हृदय फटने लगता है
और अपनी रिश्ते की अनिश्चिताओं में मन भटकने लगता है
काम करते करते ,सब के सामने जब आँखों में नमी सी उभरने लग जाती है
एक समझौता कर लेता हूँ
रोने का भी वक्त कहाँ ,दो चार आहें भर लेता हूँ |

थक कर जब तेरे कंधे पर सर रख के सोने का मन करता है
सब छोड़ जब तेरे पास आ जाने का मन करता है
जब तुम बिन जीवन का अर्थ और उद्देश्य धूमिल दिखाई पड़ते है
एक समझौता कर लेता हूँ
तू न सही ,तेरी तस्वीर को बांहों में भर लेता हूँ |

दिल को कितना समझाया पर जजबात नहीं बदलते
सब करके देखा ,हालात नहीं बदलते
जब बदल नहीं सकता इन हांथो की लकीरों को
एक समझौता कर लेता हूँ
डूब कर प्यालों में शाम बदल लेता हूँ |

तुम बिन कितना घर खाली, कितने हम अधूरे हैं
इन्टरनेट,फिल्मे,टीवी मन बहलाने के साधन तो बहुतेरे हैं
फिर भी अकेलेपन से जब जी घबराने लग जाता है
एक समझौता कर लेता हूँ
लोग कहे इसे पागलपन ,मैं आईने से बाते कर लेता हूँ |

Nishikant

Hindi Love Poem

Monday, January 2, 2012

हर बार मुझसे अब ये होता नहीं है

कितना भी यत्न कर लूं
टीस है जो कम होती नहीं है
रोता है रोम रोम मेरा
बस ये आँखें हैं जो रोती नहीं हैं |

रोज़ सोचता हूँ कि आज सोऊंगा चैन से
ओढ़ कर सपनों की चादर
पावँ हो गए है लम्बे मेरे
ये चादर भी पूरी होती नहीं है |

देख कर खुद को यकीं होता नहीं है
क्या से क्या हो गया मै ,क्या ये सही है ?
किस पर करूं ऐतबार मेरे यारों
कि अब तो खुद पे भी भरोसा होता नहीं है |

हाँ उसकी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी है
बार बार ,हर बार मुझसे अब ये होता नहीं है
हाँ दिल ने मजबूर किया था प्यार हो गया
पर प्यार खुद कोई मज़बूरी तो नहीं है |

Nishikant Tiwari

Hindi Love Poems

Monday, November 14, 2011

जन्मदिन (Hindi Love Stories)

२६ सितम्बर 2011 कोई विशेष दिन नहीं था |सब कुछ सामान्य ही था | सूर्य सदैव की तरह पूरब में ही उगा था | हवा की रफ़्तार भी शांत  थी | दूधवाला दूध पहुंचा रहा था | अखबारवाला घरों में अखबार फेकता जाता था | बच्चे स्कूल के लिए तैयार हो रहे थे उनके माता पिता ऑफिस के लिए| कुल मिलाकर सभी जीवन की नीरसता में व्यस्त थे सिवाए एक के दिव्या | उसने रात करवटों में काटी थी यह सोचते हुवे कि कल वो क्या क्या करेगी | आज का दिन उसके लिए खास था |आज मेरा जन्मदिन जो था | सभी लोग अपना जन्मदिन बड़े धूम-धाम से मानते हैं | केक काटा जाता है | मिठाइयाँ बांटी जाती है | दावत उडाये जाते है | बड़ी मौज-मस्ती होती है | मैं जन्मदिन मनाना आत्मप्रशंषा जैसा समझता हूँ | मुझे नहीं लगता कि पैदा होकर मैंने कोई महान काम कर दिया है जिसके लिए इतना शोर मचे | मैं अपना जन्मदिन उस दिन मनाऊंगा जब मैं जिंदगी में ऐसा मुकाम हासिल कर लूँगा जिसपर मुझे गर्व हो | जब भी कोई मुझसे मेरे जन्मदिन के बारे में पूछता भ्रमित करने के लिए कोई भी दिन बता देता |
यह सभी जानते है कि लड़कियां कितनी हठी होतीं हैं | हमारे शास्त्र भी यही कहते है कि स्त्रियों और बच्चों से प्यार से पेश आना चाहिए, वे बड़े हठी होतें है | दिव्या ने एक दिन जिद्द करके मुझ से जन्मदिन उगलवा हीं लिया | उसके लिए जन्मदिन खास महत्व रखता है | अपने हर दोस्त को फोनकर जन्मदिन की बधाई देना ,खास दोस्तों को बधाई के साथ उपहार भेजना उसकी आदत है फिर वो अपने सबसे प्रिय दोस्त का ये दिन कैसे भूल जाती |
२६ सितम्बर के पहले वाली रात को उसे नौ बजे से हीं नींद आ रही थी पर किसी तरह आँखों में पानी झोंक-झोंक कर जगी रही | ठीक बारह बजे उसका फ़ोन आया -"हैप्पी बर्थडे टू यू "  |
मै थोडा अनजान बनते हुए  -"किस बात के लिए ?"
"आज तुम्हारा जन्मदिन है ना !!"
"नहीं, किसने कह दिया !"
"झूट मत बोलो |तुम्हीं ने बताया था कि आज तुम्हारा जन्मदिन है | मैं कुछ नहीं जानती |"
मैं खुद पर नाराज़ हो रहा था |बेकार में उसे जन्मदिन बता दिया | अब फालतू का हो-हल्ला होगा  |
मैं कर्कश स्वर में बोला -"बोला ना आज मेरा जन्मदिन नहीं है सो नहीं है |"
दिव्या-"तुमने झुठ  क्यों बोला ?"
"ऐसे ही ,तुम बार-बार पूछ रही थी सो मैंने ऐसे ही कोई दिन बता दिया |"
उसका फिर से वही रट कि मैंने झुठ क्यों बोला | हाँ पर इसबार उसकी आवाज़ कुछ भरी हो गयी थी |आँखों में आंसू भी झलक हीं गए होंगे | इससे पहले की बात और बढे मैंने फोन स्विच ऑफ कर दिया | इतना सब होने के बाद नींद कैसे आ सकती थी | लेटे हुए सोचता रहा-"वैसे तो मैं कोई अच्छा काम करता नही हूँ कम से कम कुछ बुरा तो ना करूँ | वो भी आज के दिन आज तो मेरा जन्मदिन है | उस बेचारी को अकारण हीं रुला दिया | मैं भी तो बेकार की जिद्द किये बैठा हूँ | " कई बार मन हुआ कि उसे सच बता दूँ पर हर बार मेरे जिद्द ने मुझे रोक लिया | मेरे भीतर चल रहे इस अंतर्द्वंद को निद्रा एक घंटे तक दूर से निहारती रही फिर धीरे-धीरे पास आती गई और कब मुझे बांहों में समेट लिया पता ही नहीं चला |
प्रातः आँख खुली तो दिन को मैंने अलग नज़रिये से देखने की कोशिश की | शायद औरों को आज का दिन विशेष दिखता हो पर मुझे कुछ भी अलग नहीं लगा | मैंने बरामदे में जा कर अनूठापन तलाशने का प्रयास  किया  पर कोई लाभ नहीं | दूधवाला ,अखबारवाला , सब्जीवाला सभी रोज की तरह अपने काम में व्यस्त थे | ना सूरज की किरणों में कोई जादू था ना शीतल ब्यार में | तुरंत हीं मोह-पाश से निकला और स्नान करने चला गया | आकर देखा की फोन में ढेरों मिस कॉल और sms थे | सब दिव्या के |
"तुम मेरा फोन क्यों नहीं उठा रहे |प्लीज एक बार मुझसे बात कर लो | मुझे पता है मैं तुम्हे बहुत तंग कर रही हूँ | आई ऍम सॉरी बस एक बार बात कर लो |"
इससे पहले कि फोन करता उसका वापस से फोन आ गया |
"क्या हुआ ,फोन क्यों नहीं उठा रहे थे ?"
"मैं बाथ रूम में था |"
"अच्छा सुनो ना |"
"हाँ बोलो मैंने कान नहीं बंद कर रखे |" मैं पता नहीं क्यों बेरुखी से बात कर रहा था |इतना तो अब समझ में आ हीं गया था कि आज का दिन मेरे लिए अलग कैसे है |
दिव्या -"क्या तुम मेरे साथ ऑफिस चलोगे ?"
"नहीं तुम जाओ ,मैं स्वयं आ जाऊँगा |"
"मेरे साथ चलो ना |"
मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा |
"क्यों ?"
"ऐसे हीं |" मैं उससे अनायस हीं लड़ रहा था | मैं उससे नाराज़ क्यों था ? बस इस लिए कि उसने जन्मदिन की बधाई दी ?या इसलिए कि उसके जीवन में मैं इतना महत्व क्यों रखता हूँ ?
वो बार-बार आग्रह करती रही और मैं मना करता रहा | हर आग्रह में उसकी आवाज़ पहले से भारी होती जा रही थी | गला रुन्धता जा रहा था जैसे वो किसी दल-दल में फंसती जा रही थी फिर भी कदम बढाए जा रही थी | मैंने फोन काट दिया तो उसने पुनः प्रयास किया | यह क्रम कई बार हुआ | अंत में मुझे हार माननी पड़ी और साथ जाने के लिए तैयार हो गया |इससे पहले कि वो मेरे फ्लैट पर पहुँचती मैं अतिशीघ्र तैयार हो निकल गया और सड़क किनारे प्रतीक्षा करने लगा | थोड़े हीं देर में वो अपने स्कूटी से आ पहुंची | आँखे लाल सुझीं हुईं ,भृकुटी सिमटी हुई मुखड़े पर एक विचित्र सी उदासी | उसका मासूम सा चेहरा भूख से बिलखते गरीब शिशु सा हो गया था | वो भी तो प्यार की भूखी थी जो आज उसे मिल नहीं पा रहा था | उसे इस हालत में देख हृदय करुणा और ग्लानि से भर गया | वो कहते हैं ना कि चीता अपने शारीर के निशान नहीं छोड़ता |  इतना सब होने पर भी अपनी व्याकुलता छिपाते हुए रोष का मिथ्या अवारन ओढ़कर बोला -"चलो ऑफिस |"
"क्या आप मुझसे नाराज हो ?"
"नहीं |"
"तो फिर ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे ?"
"ऐसे हीं और ये ज़रूरी तो नहीं कि इन्सान हर समय हिहियाता रहे |"
दिव्या -"अच्छा सुनो ना |"
"हाँ बोलो |"
"थोड़ी देर के लिए फ्लैट पर चलोगे क्या ?"
 
"क्यों हमें तो ऑफिस जाना है |"
"नहीं प्लीज चलो ना |"
"तुम हर चीज़ में जिद्द क्यों करने लगती हो ?चुप-चाप ऑफिस चलना है तो चलो वरना मैं अकेले हीं चला जाऊंगा |" यह कहकर चलने हीं लगा था कि उसने हाथ पकड़ लिया | उसके नयनों से बहती अश्रुधारा मुझे जाने क्या क्या कह रही हो पर वो निः शब्द मुझे देखती रही |उसकी मनोदशा को ब्यान करने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं थी | अश्रुओं ने बाढ़ जैसी स्थिति उतपन्न कर दी जिसे तैर कर पार कर पाना मेरे लिए संभव ना था | मौन का उत्तर मैंने मौन से हीं दिया और सर लटकाए फ्लैट की ओर वापस लौट चला जैसे की मेरी गाड़ी छुट गई हो |  

उसने अपने बैग से उपहार निकाल के मेरे सामने रख दिया | बोली -"ये तुम्हारे लिए लाई थी तुम्हारा जन्मदिन समझकर |मैं इसे वापस नहीं ले जा सकती |"
"मैं इसे नहीं ले सकता | मैं उपहार स्वीकार नहीं करता और वैसे भी आज मेरा जन्मदिन नहीं है | इसे वापस से जाओ |"
"मैं पहले से हीं बहुत दुखी हूँ ,मुझे और चोट मत पहुँचाओ | यह सोचकर कि आज तुम्हारा जन्मदिन है मैं पिछले १५ दिनों से तैयारी में लगी थी | आज के पल-पल की प्लानिंग कर ली थी | तुम्हे पता है मैं काजल नहीं लगाती | आज बस तुम्हारे लिए लगा कर आई थी |"
अचानक उसके संयम का बाँध फिर टूट गया और आंसुवों की बाढ़ काजल को धोने लगी | अब तो मेरी अंतरात्मा भी मुझे धिक्कारने लगी थी | अपराध का भाव मुझे बेड़ियों सा जकड़ा जा रहा था | दुनिया में मेरी माँ के अलावा ऐसा कौन होगा जिसने मेरे लिए आज रोया हो | नहीं मैं स्वयं अपने हांथो इस निर्मल हरे प्यार पल्लव को नहीं मसल सकता था | बोलना चाहा कि आज हीं मेरा जन्म हुआ है पर आवाज़ हीं नहीं निकल पाई |  उसने एक चेन निकला जिस पर बड़ी मेहनत से मेरा नाम गुथा हुआ था | आंसुवों की बड़ी-बड़ी बूंदे चेन पर गिरने लगीं | जिन्हें निराकार इश्वर दिखाई नहीं देते वो मंदिरों में उन्हें ढूढ़ते फिरते है | मैं  भी उन्ही हीं की तरह अँधा बना बैठा था | वो मेरे नाम पर रो रही थी इसमें अब दो राय नहीं थी | मेरी आँखों से पश्चाताप बह चला | मैंने झट से उसे गले लगा लिया | दोनों के अश्रु मिले तो दिल भी मिल गए | मैंने धीरे से उसकी कान में कहा -"आज हीं मेरा जन्मदिन है पगली |"

Hindi love stories -janmdin - by Nishikant Tiwari

Friday, November 11, 2011

तुम अगर मुझको ना चाहो तो कोई बात नहीं

This is a song from a hindi movie  .I liked it very much .

तुम अगर मुझको ना चाहो तो कोई बात नहीं
तुम किसी और को चाहोगी तो मुस्किल होगी |
अब अगर मेल नहीं है तो जुदाई भी नहीं ,
बात अगर तोडी नहीं तुमने तो बनाई भी नहीं ,
ये सहारा बहुत है मेरे जीने के लिए ,
तुम अगर मेरी नहीं तो परे भी नहीं ,
तुम मेरे दिल को न सराहोगी तो कोई बात नहीं ,
तुम गैर के दिल को सराहोगी तो मुस्किल होगी ,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुस्किल होगी |
     
तुम हसीं हो तुम्हे प्यार हीं सब करते होंगे ,
मैं जो मरता हूँ तो क्या और भी मरते होंगे ,
सबकी आँखों में इसी शौक का तूफान होगा ,
सबके सिने में यही दर्द उभरते होंगे ,
मेरे गम में ना कराहों तो कोई बात नहीं ,
किसी और के गम में कराहोगी तो मुस्किल होगी ,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुस्किल होगी |
       
फूल की तरह हंसों, सबकी निगाहों में रहो,
अपनी मासूम जवानी की पनाहों में रहो,
पर मुझको वो दिन ना दिखाना तुझे अपनी हीं कसम,
मैं तरसता रहूँ ,तुम गैर की बांहों में रहो ,
तुम अगर मुझसे ना निबाहोगी तो कोई बात नहीं ,
किसी दुश्मन से निबाहोगी तो मुस्किल होगी ,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुस्किल होगी |

Tuesday, October 11, 2011

Love letter to Payal

Dear Payel,



I am feeling a bit uneasy to express myself but I am determined to do so. I can see the same uneasiness on your face but please be calm & cool while you go through this.

I would like to open up my heart to you, but I may lack the skill, or I'm short for words, because my heart harbors so many good feelings towards you that the dictionary seems to short to express all this.

When I saw you for the first time, I couldn¹t ever have imagined that your almost candid face, which holds a young and shy smile, was going to captivate me the way it did. We used to stand in lunch queue near each other and we used to look at each other very indifferently but one day your attention was caught my eyes leading me into the state of attraction, infatuation, bliss or whatever you say.



It perhaps started around two months back and with time the attraction or infatuation has shaped into a respect, all because of your ability to be simple while being attractive. I can see shy in your eyes (very uncommon these days) and your all way of talking, dressing etc brings delight to my heart because it's away from pomp and show.

I don't know if you have ever noticed my interest or this old passion, but now I am declaring it to you. Maybe this letter won't change at all the way you react to me, but I feel somewhat relieved for having clearly expressed these feelings I have nurtured for you for such a long time.

I have not written all this to impress you to become my girl friend and start spending weekends with me but just to be a simple friend so that I could know you better and respect you more than even before. Even you continue through e mails I don't mind.

Please do response I am eagerly waiting for it. If you don't respond I will take it as a silent acceptance. I apologize if this letter has caused any kind of trouble to you and I promise I would never try to contact you or speak about you any further but only when you let me know your views.



With Regards& Respect

Nishikant

पायल से तो घायल होना हीं था (Hindi Love Stories)



कॉलेज से निकलते हीं मुझे एक सॉफ्टवेर कंपनी में नौकरी मिल गयी |कॉलेज में बहुत सुन रखा था कि कंपनियों में एक से बढ़कर एक सुन्दर लड़कियां काम करती है |सोचा प्यार की नैया जो कॉलेज में पानी में तक उतर ना पायी थी उसे कंपनी में गहरे समुंदर तक ले जाऊँगा |मैं यहाँ आते हीं उस अप्सरा की खोज में लग गया जिसे इस कहानी की नायिका बनना था पर किस्मत ने यहाँ भी साथ नहीं दिया |कोई भी लड़की पसंद नहीं आई | जो प्यार नहीं करते वो लड़कियों की बातें करते है | मैं भी उनसे अलग नहीं हूँ | यहाँ कंपनी में मेरी कई लोगो से दोस्ती हो गयी थी और सबकी मेरी जैसी हीं स्थिति थी | जिस प्रकार कामसूत्र के रचयिता वात्स्यान ने नारी जाती को मोरनी ,हिरनी आदि भागो में विभक्त किया है वैसे हीं उनसे प्रेना पाकर हमने भी लड़कियों की कोडिंग स्कीम तैयार कर ली थी |हमने लड़कियों को चार भागो में बांटा
१. वेरी गुड आईडिया
२. गुड आईडिया
३. नोट अ बैड आईडिया
४. नोट अ आईडिया एट ऑल
साथ हीं हमने सभी के पर्यावाची नाम भी रख दिए थे | उदाहरण के तौर पे मेरे सामने वाली लाइन में बैठी दो युवतियों का नाम हमने रूपमती और डबल बैटरी रखा था क्योकि एक बहुत सुंदर थी दूसरी बहुत मोटी |इस प्रकार के नाम कारन की आवश्यकता इस लिए पड़ी क्योंकि हमें किसी का नाम पता नहीं था |गुणों के हिसाब से नाम रखने पर याद करने में आसानी होती थी |इससे एक और लाभ यह था कि सामने वाले को मालुम नहीं चल पता था कि आप किसकी बात कर रहे है |

मेरे सीट के तीन चार पंक्ति पीछे एक सीधी सादी लड़की बैठती थी |नाम तो उसका पता नहीं था सो हम उसे नोट अ बैड आईडिया कहा करते थे |काफी दिनों के बाद पता चला कि उसका नाम पायल है | पायल और घायल कितना मिलता जुलता है और मेरे जैसा सड़क छाप कवि अगर शब्दों के जाल बुनकर उसमें ना उलझे तो कवि कैसा ?
देर से हीं सही पर घायल होना हीं था | ऑफिस में इतनी सारी लडकियां थी पर मुझे वो हीं पसंद क्यों आई ये सवाल बार बार तंग करता | मंथन करने पर भीतर से उत्तर आया कि मुझे एक ऐसी लड़की चाहिए जो सुंदर होने के साथ साथ कोमल ह्रदय वाली हो और बुद्धिमान होते हुवे भी भोली हो | जिसकी आँखों में शर्म हो व अपने देश कि संस्कृति झलके |मैं नहीं जानता पायल कितनी समझदार थी या सह्रिदयनि थी पर उसकी अंकों में वो लज्जा थी जिसकी मुझे तलाश थी |उसका चल चलन बात ब्योहार एक विशिष्ट शालीनता समेटे हुवे था |

पहले उसमे मेरी बहुत रूचि नहीं थी हमें दोपहर के खाने के लिए बसेमेंट में लाइन लगाना पड़ता था |अक्सर वो एक दो लोगों के आगे या पीछे लगती |कभी कभी एक दुसरे पर नज़रें पड़ जातीं पर हमारे दर्शन में सहजता रहती कोई विशेष बात नहीं |एक दिन मैं ऑफिस के बाहर किसी का इंतज़ार कर रहा था पास में हीं पायल भी किसी का इंतज़ार कर रही थी |शायद किस्मत को इसी घड़ी का इंतज़ार था |हम मौन होकर भी बातें कर रहे थे | मैं खुद को उसके इतना पास महसूस कर रहा था कि उसकी आँखों की शीतलता मन में कप कपी पैदा कर रही थी | कुछ दिनों के बाद जब मैं अपने दोस्तों के साथ दोपहर का भोजन कर रहा था तभी ध्यान दिया कि पायल एक लड़के के आड़ में जो कि उसके साथ खाना खा रहा था मुझे घूर रही है |अचानक उस लड़के ने अपना सर पीछे किया और हमारी नज़रें टकरा गयीं |उसने ना नज़रें हटाई ना नीची कीं |एक टक घूरते हुवे मुस्कुरा दी | मैंने शर्म से आँखे नीची कर ली | हम लड़के तो कत्ल होने के लिए तैयार बैठे रहते है | उधर नज़रों का तीर चला नहीं की हम घायल होकर आंहे भरने लगते है |
अगले दिन जब मैं बसेमेंट से नास्ता करके उपर आ रहा था कि कुछ साथी मिल गए और मैं हंसी के गोले दागने लगा जिससे पूरा बसेमेंट गुंजयमान हो उठा |मैं हँसता हुआ सीढियां चढ़ रहा था कि पायल उतरती हुई दिख गयी |मुझे देख कर हंसी और दौड़ती हुई नीचे उतर गयी |उसकी हंसी ने मन में एक उत्सुकता जगा दी | मैं बार बार अपनी सीट से पीछे मुड़कर देखता कि कहीं वो मुझे देख तो नहीं रही है और एक दो बार तो ऐसा करते हुवे पकड़ भी लिया तब से रोज़ पुरे दिन यही सिलसिला चलता रहता |कभी वो छुप छुप के देखती कभी मैं |सारा दिन कभी पानी पिने के बहाने कभी चाय पिने के बहाने किसी ना किसी काम से निकलता रहता |बन्सीवाले तेरे खेल निराले है | धीरे धीरे मेरी उत्सुकता में बैचनी और जलन का रस घुलने लगा | कोई भी उससे बात करता तो मन में टीस होती |दिल को समझना पड़ता कि किसी भी लड़के से उसकी दोस्ती नहीं हो सकती सिवाए मेरे बल्कि मेरे अलावा कोई उसके काबिल हीं नहीं है | दिन भर के कोलाहल के बाद कमरे पे लौट के प्यार वाले मीठे मीठे गीत सुनता |एक दिन ध्यान आया कि ऑफिस में हुवे जश्न में उसकी भी है तस्वीर है तब से रह रह के उसकी तस्वीर को देख लेता | कभी बेवजह हीं कुश हो जाता तो कभी बिना कारण हीं मन भारी हो जाता | मेरा दिल अब मेरा नहीं रह गया था | उस पर कोई और राज करने लगा था | मैं एक ऐसे रास्ते पर चल रहा था जिस पर अंगारें हीं अंगारें थे और आगे बढ़ने के साथ साथ उनकी की ताप बढती चली जा रही थी |

मैंने अपने दोस्त रमेश को सारी कहानी सुनाई |"यार मैं सोंच रहा हूँ क्योना पायल को एक इ मेल लिंखू |अगर वह जवाब देती है तो ठीक है वरना कोई बात नहीं | मेरी प्यार की कहानी काफी दिनों से एक मोड़ हीं पर अटकी पड़ी है आगे तो बढे |वह बोला " नहीं नहीं ऐसा मत करो |शांतनु रोज़ उससे ऑरकुट पर पायल के किसी दोस्त द्बारा भेजे गए एक स्क्रैप के लिए लड़ता रहता है |तुम्हारा इ मेल देख तो तूफ़ान मचा देगा | " "पर ये शांतनु है कौन ? " "उसका बॉय फ्रेंड " उसने एक लड़के के तरफ इशारा करते हुवे बोला | " शांतनु और पायल कॉलेज से हीं दोस्त है और इस कंपनी में भी दोनों ने साथ हीं ज्वाइन किया था |"
ह्रदय की एक एक धड़कन में लहू की जगह जहर समां गया था | मैं फिर अपने किस्मत को कोसने लगा | मैं उसके प्यार में इतना अँधा हो चूका था कि मुझे यह भी दिखाई नहीं दिया कि कोई और उसका प्यार है |उसकी स्वाभाविक हंसी को मैं प्यार का गीत समझ कर ना जाने क्या क्या सपने देखने लगा था | खुद को बहुत समझाने का प्रयास कि उसे भूल जाऊं पर रह रह के मन में यही ख्याल आता कि वो भी मुझसे थोड़ा हीं सही पर प्यार ज़रूर करती है | उसका मुझे देख कर शर्मा जाना इस बात का प्रतिक था | बहुत कोशिश कि मन उसकी तरफ से हट जाए पर जितना मैं उसे भूलने कि कोशिश करता उतना हीं याद आती |वक्त हर दर्द कि दवा है | सोंचा एक दो महीने में आकर्षण अपने आप कम जो जाएगा और मैं दर्द के सागर से उबर जाऊँगा पर ऐसा नहीं हुआ | रोज पायल और शांतनु को हंसते बोलते देखना और दिल को नया घाव लगाना जैसे आदत सी बन गई थी | २- ३ महीनें और निकल गए पर फिर भी जब मैं मोहपाश से न निकल सका तब आखिरकार इ मेल लिखने कि ठानी |
बात करने की हिम्मत तो थी सो बस इ मेल का हीं सहारा था | मैंने एक नयी आईडी बानायी और एक अच्छा सा मेल लिख कर भेज दिया कि मैं उससे दोस्ती करना चाहता हूँ |सोचा अगर कुछ बात हो गयी तो कह दूंगा कि ये इ मेल मेरा नहीं है किसी ने तुम्हारे साथ मज़ाक किया है |इ मेल भेजते वक्त बार बार रमेश की बातें याद आ रही थी पर मन में आया कि अगर किसी रिश्ते में साधारण मेल या स्क्रैप पर टूटने की नौबत आ जाये तो ऐसे रिश्ते को टूट हीं जाना चाहिए |

हर घंटे इ मेल खोल के देखता कि जवाब आया कि नहीं पर एक सप्ताह निकल गया कोई जवाब नहीं आया |उसकी खामोशी सब ब्यान कर रही थी और मैं था कि सब कुछ जानकर भी मानने को तैया नहीं था | एक दिन मैं जिद्द पे अड़ गया कि आज जवाब लेकर हीं रहूँगा |उसे बहुत देर तक घूरता रहा और ऐसा हीं शाम को आखिर जवाब आ हीं गया | "हमें आपकी दोस्ती मंजूर है पर कृपया करके उससे ज्यादा कुछ मत समझियेगा |" मेल पढ़ के बड़ी प्रसन्नता हुई |महीनो के सींचने के बाद बाग़ में फुल जो आने लगे थे |यह छोटा सा मेल अपने आप में बड़े मायने समेटे हुए था | मैंने आज तक उससे एक बार भी बात नहीं की थी | मेरा मौन व्रत जैसे वज्र सा हो गया था जिसे तोड़ना मुझे असंभव जान पड़ता था |
मैं रोज उसके सीट के पास जाता पर उससे बात करने के बजाये अगल बगल के लोंगो से बात करके लौट आता |लौट कर स्वयं को कोसता भी पर अगले दिन फिर वही करता | ऐसे हीं एक महीना निकल गया |शनिवार का दिन था |मैं कमरे में बैठा दीवारों और छत को घंटो निहारता हुआ सोच में डूबा था | मैं कितना कायर हूँ | एक लड़की तक से बात नहीं कर सकता जबकि उसने हामी भी भर दी है | मैंने दृढ प्रतिज्ञा ली कि सोमवार को हर हालत में उससे बात करूँगा और अपने बर्ताव के लिए मारी भी मांगूंगा |

सोमवार को ऑफिस नहीं आई | मंगलवार का दिन भी खाली गया |पूरा सप्ताह निकल गया पर उसका कोई खबर नहीं थी | मुझे अपने आप को साबित करना था कि मैं उतना भी कायर नहीं हूँ | जब वह अगले सप्ताह भी नहीं आई तो मैंने मेल लिखा |"
पायल ,
मैं आशंकित हूँ कि कहीं तुम्हारी तबियत तो खराब नहीं हो गयी है |पिछले १५ दिनों से तुम ऑफिस जो नहीं आई हो | तुम कहाँ हो ? तुमसे बात करने का बड़ा मन कर रहा है | तुम सोचोगी कि मैं भी अजीब हूँ जब तुम सामने थी तो कभी बात नहीं किया और अब बात करने के लिए बेताब हो रहा हूँ |पायल मैं मजबूर था | मैं डरता था कि मुझे बात करते देख शांतनु शायद तुमसे लड़ने ना लगे | मैं तुम्हे हमेशा खुश देखना चाहता हूँ पर मुझे ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे चेहरे पर हमेशा एक हलकी सी वेदना छाई रहती है |पता नहीं ये सच है गलत | शायद मुझे यह पूछने का कोई हक़ नहीं फिर भी अगर तुम बता सकती तो मन को शांति मिलती |जल्दी आने की कोशिश करना |मुझे बेसब्री से तुम्हारा इंतज़ार रहेगा |

उसने जवाब में लिखा
रितेश मैंने कंपनी छोड़ दी है और अपने घर कोलकाता चली आई हूँ | शांतनु ने मेरा जीना हराम कर दिया था | बात इतनी बढ़ गयी कि पिताजी तक जा पहुंची और वे मुझे गुडगाँव आकर ले गए | मैं अब कभी नहीं आ सकती |
तुम्हारी दोस्त
पायल
यह पढ़ के सदमा सा लगा | मैं समझता था कि पायल और शांतनु में गहरा प्यार है और दोनों जल्द हीं शादी करने वाले है पर यहाँ तो बात कुछ और हीं थी | काश मैं उससे पहले बात कर लेता तो उसे जाने से रोक पाता | उसका कैरियर बर्बाद होने से रोक लेता | मेरा मन मुझे धिक्कारने लगा | छुट्टी हो चुकी थी | मैं भारी क़दमों से राह में पड़े पत्थरों को ठोकर मारता हुआ कमरे की तरफ बढ़ने लगा | रास्ते में इतनी धुल थी की जैसे में उसमे खो गया था | एक पत्थर से चोट लग गयी और अंगूठे से खून बहने लगा | अच्छा हुआ मुझे और भी बड़ी सजा मिलनी चाहिए |
मैं और जोर जोर से ठोकरें मारने लगा | खून से बने पग चिह्न सड़क पर नहीं मेरे दिल पर पड़ रहे थे | कई इ मेल लिखे मोबाइल नो ० माँगा पर कोई जवाब नहीं आया | मेरा इंतज़ार एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार बन के रह गया था | इश्वर से बस यही प्रार्थना करता कि कोई भी उसकी जिन्दगी में आए पर मेरे जैसा कोई ना आये |पता नहीं वह किस हाल में होगी | घरवाले अब उसे शायद कभी नौकरी करने नहीं देंगे| पास होकर भी मैं उसके इतने पास नहीं था जितना कि अब हो गया हूँ | उसकी सिसकियों को सुन सकता हूँ | उसके घुटन को महसूस करके रह रह के गला रुंध जाता है |


Hindi Love Stories - Payal se to ghayal hona tha  by Nishikant Tiwari

Aab mai kaya kahu ?  हो जज़्बात जितने हैं दिल में, मेरे ही जैसे हैं वो बेज़ुबान जो तुमसे मैं कहना न पाई, कहती हैं वो मेरी ख़ामोशियाँ सुन स...